माइक्रोसॉफ्ट ₹14,000 करोड़ में इंसानी मल-मूत्र क्यों खरीद रहा है? क्या है बिल गेट्स का प्लान?
क्या मलमूत्र ही दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों को बचाएगा? सवाल सुनकर दिमाग घूम गया ना? अच्छा जरा सोचिए अगर आपको कोई कहे कि दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में से एक Microsoft अब इंसानों का मलमूत्र गोबर और सीवेज खरीद रही है और वह भी 1.7 अरब डॉलर यानी करीब ₹1000 करोड़ में। आप चौंक जाएंगे, घबराएंगे और शायद हंस भी पड़े। लेकिन यही सच्चाई है। और इसके पीछे छुपा है एक ऐसा मिशन जो पूरी धरती को बदल सकता है। चलिए पूरी खबर की पढ़ते खोलते हैं। नमस्ते। मैं हूं असीम और आप देख रहे हैं एनडीt इंडिया। Microsoft ने हाल ही,
में एक अमेरिकी स्टार्टअप कंपनी व्ट डीप के साथ 12 साल का एक गुप्त समझौता किया है। इस समझौते के तहत Microsoft हर साल लाखों टन जैविक कचरे को जमीन के 5000 फीट नीचे गाड़ेगा। लेकिन सवाल है क्यों? आखिर क्यों एक टेक्नोलॉजी जांट जो एi और क्लाउड कंप्यूटिंग की दुनिया में काफी आगे बढ़ चुका है। अब गंदगी और गोबर का व्यापार कर रहा है। चलिए जानते हैं इसके पीछे की असली कहानी क्या है। एi का दौर जैसे-जैसे तेज हो रहा है। माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों की बिजली की भूख भी आसमान छू रही है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं। सिर्फ 2020 से 2024 के,
बीच Microsoft ने 75.5 मिलियन टन कार्बन वातावरण में छोड़ा। इसका एक बड़ा हिस्सा उनके एआई डाटा सेंटर्स में आता है जो 24 घंटे बिजली चूसते हैं। अब माइक्रोसॉफ्ट की कोशिश इस प्रदूषण की भरपाई करने की है और यही वजह है कि वो अब कार्बन रिमूवल के सबसे अनोखे रास्ते पर निकल पड़ा है। इंसानों की गंदगी को जमीन में गाड़ने का रास्ता। अब सवाल है कि वोल्टेज डीप नाम की यह कंपनी करती क्या है? जिसके साथ Microsoft ने समझौता किया है वो भी हजारों करोड़ रुपए का। यह कंपनी टॉयलेट, खेतों और फैक्ट्रियों से निकलने वाले गीले जैविक कचरे को इकट्ठा करती है।
इसे यह लोग बायोस्लरी कहते हैं। फिर इस बायोस्लरी को एक खास प्रक्रिया के तहत पीसकर बहुत गहरे लगभग 1 1/2 कि.मी. जमीन के नीचे इंजेक्ट कर दिया जाता है। अब आप सोचेंगे इसमें फायदा क्या है? क्यों किया जाता है? असल में जब यह कचरा सतह पर पड़ता है तो इससे निकलता है मीथेन गैस जो कार्बन डाइऑक्साइड से चार गुना ज्यादा खतरनाक है। लेकिन अगर इसे गहराई में स्थाई रूप से दबा दिया जाए तो यह गैसें बाहर नहीं निकलती। मतलब परमानेंट कार्बन रिमूवल। वाल्टी डीप की सीईओ जूलिया राइकलस्टीन कहती हैं, आज जो गंदगी सतह पर हमें बीमार कर रही है, हम,
उसे धरती के नीचे ले जाकर एक पर्यावरणीय समाधान में बदल रहे हैं। अब बात करते हैं माइक्रोसॉफ्ट के इस फैसले की। उनके इस फैसले से दो फायदे होंगे। पहला वायुमंडल में जाने वाला ग्रीन हाउस गैस बचेगा। दूसरा खेतों में गंदगी और पानी में जहर जैसे एफएएस जैसे खतरनाक केमिकल्स का रिसाव रुकेगा। और सबसे बड़ी बात Microsoft का यह कदम अब तक का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कार्बन रिमूवल सौदा बन चुका है। इससे पहले भी Microsoft ने एटमॉस क्लियर नाम की कंपनी से 2.36 अरब डॉलर का एक और सौदा किया था। Microsoft का सपना है कि वो 2030,
तक कार्बन नेगेटिव बन जाए और 2050 तक अपने जन्म से अब तक जो प्रदूषण उसने किया है सबको वो साफ कर दे। लेकिन सोचिए क्या हम उस दौर में पहुंच चुके हैं जहां गंदगी ही सोना बन चुकी है? क्या मलमूत्र ही दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों को बचाएगा? शायद हां, Microsoft का यह ऐसा कदम है आज जो आने वाले समय में हर बड़ी कंपनी की दिशा तय कर सकता है। गंध से निकलती है नई क्रांति की खुशबू। बस पहचानने की जरूरत है। शायद कोई कंपनी आपकी गंदगी को भी अरबों में बेच रही होगी। है ना सोचने वाली बात। यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। यह तो सिर्फ शुरुआत है। एi की दुनिया में अब वेस्ट ही असली गेम चेंजर बनने जा रहा है.



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