“मेरा पोता मुझे यहां छोड़ गया”..कूड़े के ढेर में मिली बीमारी से जूझ रही दादी..

dadi pota

क्या कोई इतना बेरहम हो सकता है कि जिस दादी ने उंगली पकड़ कर चलना सिखाया हो? उसी दादी को जब सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत हो तो उसे कूड़े के ढेर में मरने के लिए फेंक आए। आज की कहानी सुनकर शायद आपका इंसानियत पर से भरोसा उठ जाएगा। नमस्कार, मैं हूं सिद्धार्थ प्रकाश। आज मैं आपके सामने कोई आम खबर लेकर नहीं आया हूं। आज हम बात करेंगे उस घटना की जिसने मुंबई शहर को और शायद पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है,

यह कहानी है एक 60 साल की मां की। एक दादी की जिसे उसके अपने ही खून ने धोखा दिया। यह कहानी है यशोदा गायकवाड़ की। एक 60 साल की बुजुर्ग महिला जो पहले से ही स्किन कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ रही हैं। सोचिए वो कितनी कमजोर होंगी, कितनी लाचार होंगी और ऐसी हालत में वो कहां मिली किसी अस्पताल में नहीं, किसी अपने के घर में नहीं बल्कि मुंबई के आरे कॉलोनी में, सड़क किनारे एक कूड़े के ढेर में, शनिवार की सुबह थी,

मुंबई पुलिस के कुछ जवान अपनी रूटीन गश्त पर थे। तभी उनकी नजर उस कूड़े के ढेर पर पड़ी। वहां कोई था? जब वो पास गए तो उनके होश उड़ गए। एक बुजुर्ग महिला साड़ी में लिपटी। लगभग बेहोशी की हालत में गंदगी और बदबू के बीच पड़ी हुई थी। उनका शरीर इतना कमजोर हो चुका था कि वह हिल भी नहीं पा रही थी। पुलिस वालों का दिल कांप गया। उन्होंने तुरंत महिला को उठाने की कोशिश की। उनसे बात करने की कोशिश की,

जब यशोदा जी की थोड़ी हिम्मत बंधी तो उनके मुंह से जो शब्द निकले वो किसी पत्थर दिल इंसान को भी रुला दे। मेरा पोता मेरा पोता मुझे यहां लाया था और छोड़कर चला गया। सोच कर देखिए वो पोता जिसे शायद उन्होंने अपने हाथों से खिलाया होगा। जिसके रोने पर वो रात-रात भर जागी होंगी। कि उसी पोते ने अपनी कैंसर पीड़ित दादी को जिंदा लाश समझकर कूड़े में फेंक दिया। इससे ज्यादा शर्मनाक और दर्दनाक क्या हो सकता है?,

लेकिन कहानी का दर्दनाक हिस्सा यहीं खत्म नहीं होता। असली लड़ाई तो अब शुरू हुई थी। पुलिस को यशोदा जी सुबह मिली थी। लेकिन उन्हें अस्पताल में एक बेड दिलाने में पूरा दिन लग गया। जी हां, पूरा दिन एक के बाद एक कई अस्पतालों ने उन्हें भर्ती करने से मना कर दिया। वजह उनकी गंभीर हालत और कोई पहचान पत्र ना होना। यह हमारा सिस्टम है। एक तरफ पोता अपनी दादी को मरने के लिए छोड़ देता है,

और दूसरी तरफ हमारा सिस्टम उस मरती हुई महिला को वक्त पर इलाज देने से इंकार कर देता है। जैसे तैसे दिन भर की जद्दोजहद के बाद करीब शाम 5:30 बजे उन्हें कूपर अस्पताल में भर्ती कराया गया। पुलिस इस मामले की गहराई से जांच कर रही है। यशोदा जी ने हिम्मत करके पुलिस को दो पते बताए हैं। एक मलाड का और दूसरा कांदीवली का। पुलिस को शक है कि यह पते उनके रिश्तेदारों के हो सकते हैं,

पुलिस की टीमें दोनों जगहों पर जांच कर रही हैं और उस कलयुगी पोते को ढूंढ रही हैं। उनकी तस्वीर को मुंबई के सभी पुलिस स्टेशनों में भेजा गया है ताकि उनके परिवार का कोई सुराग मिल सके। आर्य पुलिस स्टेशन के एक अफसर ने कहा कि यह देखकर दिल टूट जाता है कि एक बीमार बुजुर्ग महिला के साथ कोई इतना अमानवीय कैसे हो सकता है। हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि उनके रिश्तेदारों को ढूंढकर उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए,

यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं है। यह हमारे समाज के लिए एक आईना है। यह सवाल है हम सबसे कि हम कैसे बच्चे बन रहे हैं? कैसे पोते-पोतियां बन रहे हैं? क्या हम अपने मां-बाप अपने दादा-दादी को बस एक बोझ समझने लगे हैं। सोशल मीडिया पर लोग गुस्से में हैं। हर कोई उस पोते के लिए कड़ी सजा की मांग कर रहा है,

लेकिन सजा से क्या होगा? क्या वो दर्द भर जाएगा जो यशोदा जी को मिला है? फिलहाल यशोदा जी का इलाज कूपर अस्पताल में चल रहा है। यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि अपने बुजुर्गों का ख्याल रखना हमारी जिम्मेदारी है। एहसान नहीं। आज की इस कहानी पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट में जरूर बताइएगा.

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