टेस्ट में कम नंबर आने पर बाप ने ही बेटी को कर दिया दुनिया से अलविदा..

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वो बेटी थी सिर्फ 17 साल की। सपना था उसका सफेद कोट पहनकर जिंदगियां बचाने का। लेकिन अफसोस वो अपनी ही जिंदगी नहीं बचा सकी। यह कहानी है महाराष्ट्र के सांगली की। जहां एक पिता ने अपने सपनों का बोझ अपनी बेटी पर ऐसा लादा कि उसकी जान ही ले ली,

महाराष्ट्र के सांगली में एक प्रिंसिपल पिता धोंडीराम भोंसले की बेटी साधना भोंसले 12वीं में पढ़ रही थी और नीट की तैयारी कर रही थी। नीट यानी वो एग्जाम जिसे पास करने के लिए देश भर के लाखों स्टूडेंट्स दिनरा एक कर देते हैं। साधना ने एक मॉक टेस्ट दिया था और उसमें उसके नंबर कम आए। बस इतना ही काफी था उसके पिता के गुस्से को भड़काने के लिए,

धोंडीराम भोंसले ने साधना को बेरहमी से पीटना शुरू किया। लकड़ी के डंडे से बार-बार जब तक उसकी हालत गंभीर नहीं हो गई। हालत ज्यादा खराब होने पर उसे फौरन सांगली के उषाकल अस्पताल ले जाया गया। लेकिन इलाज शुरू होने से पहले ही साधना की मौत हो गई। मारपीट में साधना भोसले के सिर में गंभीर चोटें आई थी। पिता ने गथित तौर पर अपनी बेटी की पिटाई करने की बात भी कबूली और फिर उसे गिरफ्तार कर लिया गया,

दिनांक 22725 रोजी प्रीति भोसले ही ने पुलिस ठाने तकरार दिल कि तची मुली त पति धनराम भोसले ने कॉलेज म टेस्ट म कमी मार्क मिला मे मारहान केली तंत तिला हॉस्पिटल मला हॉस्पिटल सांग उपचार दाखिल के उपचार चालू मय त वरुण कृति भोसले यनी फरियाद दिल वरुण आरोपी धराम भोसले या विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता कलम 103 एक वन जस्टिस एक्ट प्रमा गुना दाखिल आरोपी अटक के है माननीय न्यायालय हाजिर कर आरोपी दिनांक 24 परंतला है,

तपास चालू है मामले पर पुलिस ने आरोपी पिता के खिलाफ माननीय दंड संहिता की धारा बीएनएस 103 एक और किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 75 के तहत मामला दर्ज कर लिया है। आरोपी को 24 जून तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है। एक बेटी जो घर का सपना थी, जो दूसरों की जिंदगियां बचाना चाहती थी,

वह खुद अपनों के ही गुस्से की शिकार बन गई। अब सवाल यह कि क्या नंबर्स ही सब कुछ हैं? क्या एक टेस्ट, एक रैंक, एक रिजल्ट ही यह तय करेगा कि कोई बच्चा काबिल है या नहीं। आज देश में लाखों बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस बनने का सपना लिए जी रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उनके सपनों का वजन इतना बढ़ा चुके हैं कि वह उसका बोझ नहीं उठा पाते? साधना की मौत सिर्फ एक बच्ची की मौत नहीं है। यह एक सोच की हार है। एक ऐसी सोच जो रिजल्ट को इज्जत से बड़ा मान बैठी है.

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