एक से ज्यादा शादी करने के बावजूद इन बॉलीवुड अभिनेताओ के क्यों नहीं हुए बच्चे..

आप किसे अपना परिवार मानते हैं? जिनसे आपका खून का रिश्ता है या वो लोग जिन्हें आप खुद चुनते हैं? बीते कुछ हफ्तों में एक साथ चार ऐसी खबरें आई जिसने पूरे देश को भावुक कर दिया। असरानी साहब, मधुमती जी, सतीश शाह और दिग्गज अभिनेत्री संध्या शांताराम ने दुनिया को अलविदा कहा। और यहीं पर एक सवाल खड़ा होता है। इन चारों की कहानी एक जैसी क्यों थी? क्यों इन कलाकारों ने अपनी निजी जिंदगी में खुद की संतान की खुशी नहीं पाई। क्या यह नियति थी या उनका खुद का फैसला? आज हम आपको बताएंगे इन चार महान हस्तियों की वो कहानी जो हमें सिखाती है कि विरासत सिर्फ खून के रिश्ते से नहीं मिलती बल्कि आपकी कला आपके काम और आपके संपन्न से भी बनती है।

इन कलाकारों की जिंदगी का सफर ही जुनून और त्याग से शुरू हुआ। गोवर्धन असरानी और सतीश शाह दोनों ही पुणे की फिल्म इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया से निकले लेकिन दोनों का सफर अलग रहा। असरानी का जन्म एक सिंधी हिंदू परिवार में हुआ। जहां पिता की जयपुर में कारपेट की दुकान थी। पिता चाहते थे कि बेटा धंधे में आए पर असरानी को गणित से ज्यादा सिनेमा पसंद था। उस स्कूल से भागकर फिल्में देखते थे। विरोध इतना बढ़ा कि वह बिना बताए मुंबई की ट्रेन पकड़ ली। 2 साल संघर्ष करने के बाद थक कर वापस जयपुर आ गए। पर मन नहीं माना। तभी एफडीआईआई का विज्ञापन देखा और दाखिला ले लिया। 6 साल तक वह हर शुक्रवार को पुणे से मुंबई आते-जाते काम खोजते रहते।

वहीं सतीश शाह का परिवार मूल रूप से गुजरात के मांडवी का था। पर उनका बचपन मुंबई में बीता। उन्हें बचपन में एक्टिंग का कोई शौक नहीं। वह तो क्रिकेट बेसबॉल और एथलेटिक्स के चैंपियन थे। फिर आया वो इत्तेफाक जब हिंदी नाटक में एक्टरों की कमी पड़ी। उनके हिंदी टीचर ने जबरदस्ती उनका नाम लिखा। उन्होंने डरते-डरते बस टीचर की सलाह मानी, ऑडियंस की तरफ देखा ही नहीं और डायलॉग्स बोल दिए। जैसे ही नाटक खत्म हुआ, उन्हें स्टैंडिंग ओवेशन मिला। बस यही वो दिन था जब उन्होंने एक्टर बनने की ठान ली।

पिता ने ग्रेजुएशन की शर्त रखी और उन्होंने सेंट जेवियर कॉलेज में दाखिला ले लिया। जहां शबाना आजमी, फारूक शेख और अमजद खान जैसे दिग्गज भी थिएटर में एक्टिव थी। मधुमती और संध्या की कहानी तो रूढ़िवादी समाज के खिलाफ कला की जीत थी। मधुमती का जन्म मुंबई के पास ठाणे में एक रईस पारसी परिवार में हुआ। जहां उनके पिता एक जानेमाने जज थे। रिश्तेदारों के दबाव के बावजूद पिता ने कहा, देखो वह एक कला सीख रही है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। 7 साल की उम्र में डांस सीखा। 13 में खुद का डांस स्कूल शुरू किया जिसमें 300 से ज्यादा छात्र थे। उन्होंने ना सिर्फ आधुनिक नृत्य सीखा बल्कि भरनाट्यम, मणिपुरी और कत्थक में महारत हासिल की। दूसरी तरफ संध्या शांताराम जिनका असली नाम विजय श्रीधर देशमुख था। उनके पिता भी एक नाटक कलाकार थे। विजय और उनकी बहन वत्सला को पिता ने ही अभिनय सिखाया। जब शांताराम साहब अपनी फिल्म अमर भूपाली के लिए ऑडिशन ले रहे थे

तो 20 साल की विजय को देखकर बहुत प्रभावित हुए पर उन्हें डांस नहीं आता था। शांताराम साहब ने उन्हें नया नाम संध्या दिया और फिल्म का शेड्यूल बदलकर उन्हें दिन रात नित्य कला का परीक्षण दिलवाया। संघर्ष के बाद इन कलाकारों ने फिल्मी दुनिया में अपनी पहचान बनाई। असरानी ने ऋषिकेश मुखर्जी के साथ गुड्डी, बावर्ची, नमक हराम जैसी फिल्मों में काम किया। ऋषिकेश दा उन्हें अपना बेटा मानते थे। उन्होंने राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के स्टारडम को करीब से देखा और नमक हराम के सेट पर दोनों के बीच का टेंशन भी महसूस किया। लेकिन असरानी का करियर तब अमर हुआ जब उन्होंने शोले में जेलर का रोल निभाया। हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं। यह डायलॉग और उसके बाद का मशहूर हाहा जो उन्होंने बॉलीवुड फिल्म द ग्रेट रेस से लिया था आज भी उनकी पहचान है। सतीश शाह को 1983 की फिल्म जाने भी तो यारों ने कॉमेडियन के तौर पर स्थापित किया। उनकी लाश यानी कमिश्नर डिमेलो का किरदार जिसे पूरे शहर में घुमाया जाता है।

आज भी याद किया जाता है। लेकिन छोटे पर्दे पर उन्होंने कमाल किया। यह जो है जिंदगी के 55 एपिसोड में उन्होंने 64 अलग-अलग किरदार निभाए। नसरुद्दीन शाह ने खुद उनकी तारीफ करते हुए कहा था कि सटीश शाह इंप्रोवाइजेशन के मास्टर हैं। मधुमती और संध्या ने फिल्मी दुनिया से कहीं ऊपर देश सेवा और त्याग को रखा। मधुमती ने 150 से ज्यादा फिल्मों में काम किया पर वह 1962 और 1965 और 1971 के युद्धों के दौरान बॉर्डर पर जाकर सैनिकों का मनोबल बढ़ाने वाली पहली महिला कलाकारों में से एक थी। सुनील दत्त उन्हें अपनी बहन मानते थे। वहीं संध्या शांताराम ने झनक-झनक पायल बाजे, दो आंखें, 12 हाथ और नवरंग जैसी फिल्मों में काम किया और उनकी और वी शांताराम की रचनात्मक साझेदारी ने भारतीय सिनेमा पर एक अमिट छाप छोड़ी। अब आते हैं संतान सुख से वंचित रहने के सबसे संवेदनशील और साझा पहलू पर जिसने इन चारों के जीवन को एक अलग मोड़ दिया। सतीश शाह और डिजाइनर मधु शाह की लव मैरिज हुई। सतीश को मधु को देखकर पहली नजर में प्यार हुआ। उन्होंने दो बार प्रपोज किया पर मधु ने मना कर दिया। फिर साथ-साथ फिल्मों में काम किया और शादी हो गई। लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। सती शाह ने अपनी कला को ही अपना संतान माना और क्वालिटी पर काम करने का फैसला किया। वह कहते थे कि मेरा जीवन ऐसा ही रहा। एक मोहरा लगा तो बाकी सब लगते चले गए।

वहीं असरानी साहब और मंजू बंसल जी ने तो आज की ताजा खबर और नमक हराम के सेट पर दोस्ती के बाद शादी की लेकिन वह भी निसंतान थे। असरानी साहब ने अपने भाई बहनों के परिवारों से बहुत गहरा रिश्ता रखा और उन्हीं को अपना परिवार मानते थे। अंतिम समय में उनके भतीजे ने ही उन्हें मुखाग्नि दी। संध्या, शांताराम और मधुमती की कहानियां तो त्याग और बदनामी की सबसे बड़ी मिसाल है। मधुमती का पति मनोहर दीपक के चार बच्चों की परवरिश के लिए शादी से पहले ही शर्त रखी। वह अपनी खुद की संतान नहीं करेंगी। उन्होंने उन चारों बच्चों को अपनी संतान की तरह पाला। उनकी शादी करवाई। बाद में पति और एक बेटे को खोने के बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह से डांस स्कूल में समर्पित कर दिया। जहां अक्षय कुमार, गोविंद और तब्बू जैसे कई अभिनेताओं को उन्होंने प्रशिक्षण दिया। वह कहती थी कि वह अपने छात्रों को अपना बच्चा मानती हैं और संध्या की कहानी तो बलिदान की चरम सीमा है। उन्होंने चार बच्चों के पिता वीर शांताराम के लिए

अपना करियर कुर्बान किया। लोगों ने उन्हें रखेल कहकर चढ़ाया। फिल्म मैगजीन में खबर छपी कि वह जायदाद के लिए आई हैं। इन खबरों से तंग आकर संध्या ने भीष्म प्रतिज्ञा ले ली। वह आजीवन साधारण जीवन शैली अपनाएंगी और धन दौलत से दूर रहेंगी। लेकिन संतान सुख ना मिलने पर भी लोगों ने संध्या को जिम्मेदार ठहराया। सच तो यह था कि शांताराम साहब का एक एक्सीडेंट के बाद ऑपरेशन हुआ था। जिसके चलते वह दोबारा पिता बनने की शक्ति खो चुके थे। पर दुनिया ने इस बात को दबाकर रखा और संध्या को कोसा। संध्या और शांताराम का रिश्ता उस वक्त अटूट साबित हुआ जब दो आंखें 12 हाथ की शूटिंग के दौरान शांताराम साहब अंधे हो चुके थे। उस वक्त संध्या ने नर्स बनकर उनका ख्याल रखा। यही त्याग उनके प्रति लोगों का नजरिया बदलने में कामयाब रहा। बाद में शांताराम के सभी बच्चों के साथ रिश्ते मधुर होने के बाद ही संध्या ने फिल्मों से सन्यास ले लिया। अंतिम विदाई में भी इन चारों की कहानियां जुड़ी रही।

सती शाह ने 1986 में 3 महीने के भीतर अपने माता-पिता दोनों को खोने का दुख सहा। वहीं संध्या जी 94 वर्ष की उम्र में जब दुनिया से चली गई तो उनके साथ वह तमाम अधूरी कहानियां भी चली गई जिनके बारे में बरसों से फुसफुसाहट होती थी। लेकिन अंतिम दिनों में उनकी देखभाल किसने की? वही लोग जिनके खातिर उन्होंने बदनामी सही शांताराम साहब की पहली पत्नी विमलाबाई के बेटे किरण शांताराम ने उन्होंने अपने आखिरी साल शांताराम के स्टूडियो की दूसरी मंजिल पर एक छोटे से कमरे में गुजारे जहां उन्होंने खुद को और उन सुनहरे पलों की यादों को कैद कर लिया। असरानी, सतीशा, मधुमती और संध्या शांताराम इन चारों कलाकारों ने अपनी कला को ही अपना संतान बनाया। इन्होंने हमें सिखाया कि विरासत सिर्फ खून के रिश्ते से नहीं चलती। यह आपके काम, आपके त्याग और आपके संपन्न से भी बनती है। जिसने करोड़ों लोगों के दिलों में अपनी जगह बना ली। इनकी विरासत हमेशा जिंदा रहेगी।

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