अमेरिका का OYO कांड खुलते बगावत पर उतरे अंबानी? अर्थशास्त्री से करवाया नं!,गा..

अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील पर अब लग रहा है कि जो अब तक प्रधानमंत्री की हर नीति, हर रीति, हर बयान और हर गलत सही को वाजिब ठहराते रहे थे, वह भी इसे हजम नहीं कर पा रहे हैं। बीजेपी के प्रवक्ता के तौर पे काम करने वाले अमीष देवगन भी अब बीजेपी के समर्थन में कोई तर्क देने की स्थिति में नहीं है। आनंद रंगनाथन जो बीजेपी के हर बजट पर एक अर्थशास्त्री के तौर पर कभी राजनीतिक विशेषज्ञ के तौर पर सपोर्ट करते रहे थे। वो भी कह रहे हैं कि बस भाई बहुत हो चुका। यह मामला तो दबाव का है। कोई विन टू विन सिचुएशन नहीं है। अंबानी का चैनल खुलकर आ गया। मैदान में कहने लगा कि भाई यह दबाव में होने वाली डील है। यह किसी भी तरह से भारत के साथ न्याय नहीं है।

अमीष देवगन ने पूछा है कि हर डील विनविन होती है। आनंद रंगनाथन ने कहा भारत 40% तेल रूस से लेता था सस्ता और भरोसेमंद। अब दबाव में तेल बंद है। भारतीय सामान पर 18% का टैक्स है। अमेरिकी सामान पर 0%। 500 अरब की 500 अरब डॉलर की खरीद सिर्फ अमेरिका की है। यह डील या दबाव यह कैसा सौदा है? यह सवाल खड़े होने लगे। अमीष देवगन का हर डील विनविन होती है वाला दावा सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे मेल नहीं खाती। अंतरराष्ट्रीय डील स्लोगन से नहीं शर्तों से जज होती है।

जब शर्त एक तरफ़ा झुकी हो तो उसे विनविन कहना लोगों को चिढ़ाता है और जायज भी नहीं है। भारत रूस से करीब 40% तेल सस्ता और भरोसेमंद दाम पर लेता था जिससे महंगाई और इंडस्ट्री दोनों को राहत थी। दबाव में उस सप्लाई को कम करना आर्थिक मजबूरी नहीं बल्कि रणनीतिक मजबूरी है। आम आदमी को फर्क नहीं पड़ता है कि दबाव कहां से आया असर सीधे उसकी जेब पर पड़ता है। अब ट्रेड की शर्तें देखें तो असमानता साफ तौर पर दिखती है। भारतीय सामान पर 18% टैक्स और अमेरिकी सामान पर लगभग शून्य टैक्स बराबरी नहीं कहलाई जा सकती। अगर फ्री ट्रेड का मतलब यही है तो आजादी नहीं बल्कि निर्भरता बन जाती है। $500 अरब डॉलर की खरीद सिर्फ अमेरिका से करने की बार डील से ज्यादा अल्टीमेटम लगती है और यह एक दबाव है। सप्लायर बदलने की आजादी खत्म होने को मोलभाव की ताकत भी खत्म करने जैसा माना जाता है। लंबी लंबी दूरी के लिए लंबे वक्त के लिए इसका मतलब है कि आपके पास विकल्प खत्म है। दबाव ज्यादा है।

आप अपनी अर्थव्यवस्था को धकेल रहे हैं गड्ढे में। आप अपने व्यापारियों को, अपने किसानों को, अपने छोटे मध्यम उद्योग धंधे चलाने वालों को कह रहे हैं कि बस अब ताला डाल दो। इसलिए सवाल बिल्कुल जायज है कि यह सौदा इसलिए भी विनविन नहीं है क्योंकि इसमें दबाव है और दबाव के अलावा भारतीय बाजार को डुबोने का एक अल्टीमेटम है। यह दबाव किसी भी तरीके से विनविन नहीं हो सकता। समझौता यह हो ही नहीं सकता। यह एक तरफ़ा अल्टीमेटम है। जब ना कहने की गुंजाइश कम हो तो सहमति खुशी से नहीं बल्कि मजबूरी से होती है। और मजबूरी वाले सौदों पर सवाल उठाना गुस्सा नहीं बल्कि जिम्मेदारी होती है। लेकिन सवाल यह है कि यह जिम्मेदारी अब अंबानी का चैनल क्यों निभाने लगा? अंबानी के चैनल पर बैठकर यह बात क्यों होने लगी कि भाई यह डील कैसी है?

दबाव में हुई है या विनविन हुई है? अमीष देवगन जो बीजेपी के प्रवक्ता के तौर पर मशहूर हैं, जाने जाते हैं। चाहे कैसी भी चर्चा हो वो बीजेपी के खिलाफ सुनना पसंद नहीं करते। वो इस चर्चा को कर रहे हैं और सामने आनंद रघुनाथन बैठे हैं जो कह रहे हैं कि भाई यह तो दबाव की डील है। इस डील से क्या हासिल होगा यह तो सरकार जाने। अब स्थिति यह है कि विदेश मंत्री को पता नहीं। हमारे देश के वाणिज्य मंत्री कह रहे हैं कि अभी डील का फाइनल जो फार्मूला है फाइनल जो ड्राफ्ट है वो आना बाकी है। तो भाई साइन किसने किए? किसने किए साइन आधी अधूरी डील पर और जिसने किए साइन वो बताए कि ये डील क्या है? किसान अचंभित हैं। चौकन्ने हो रहे हैं

कि आखिर भाई इस डील में हमारे खिलाफ क्या कुछ है? क्योंकि 0% टैक्स लगाकर अमेरिका के कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार को खोल देना यह बता रहा है कि इस डील में दबाव से ज्यादा कुछ नहीं है। दबाव किस बात का है? यह भी बड़ा सवाल है क्योंकि एक तरफ एक फाइल खुली है। दूसरी तरफ यह डील साइन हुई है। अब यह फाइल वाली डील है या डील वाली फाइल है? इससे पर्दा उठना बाकी

Leave a Comment