क्यों चुप है बाकि मुस्लिम देश, हुवा चौंकाने वाला खुलासा..

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आज ही भारत के पीआईबी ने प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो ने एक अमेरिकी पत्रकार के उन दावों को फर्जी बताया है जिनमें यह कहा जा रहा था कि अमेरिका की नौसेना ईरान के खिलाफ युद्ध में भारत के बंदरगाहों का इस्तेमाल कर रही है। जबकि ऐसा कुछ नहीं है और यह फेक न्यूज़ है। इसके अलावा जो लोग यह कह रहे हैं कि इस युद्ध में भारत इजराइल और अमेरिका के साथ खड़ा है वो लोग भी भ्रांति फैला रहे हैं।

आज ही भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री ने दिल्ली के ईरानी दूतावास में शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए। आयतला खामने की मौत मौत पर शोक व्यक्त किया है। यह युद्ध जितनी तेजी से फैला है, उतनी तेजी से पहले और दूसरे विश्व युद्ध का भी विस्तार नहीं हुआ था। इसके अलावा पहला और दूसरा विश्व युद्ध लड़ा गया तब किसी देश के सामने परमाणु हमले का खतरा तो नहीं था।

अमेरिका ने जुलाई 1945 में जब हमले पहली बार परमाणु हथियार का परीक्षण किया तब यह युद्ध अपनी ढलान पर था और लगभग खत्म होने वाला था। लेकिन इस बार के युद्ध में शुरुआत से ही परमाणु हमले का डर छिपा है और अब तो ईरान ने चेतावनी दी है कि वो इस युद्ध में इजराइल के डिमोना न्यूक्लियर रिएक्टर या डिमोना परमाणु ठिकाने को निशाना बना सकता है।

डिमोना इजराइल का वही शहर है जहां न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर को इजराइल के परमाणु कार्यक्रम का सेंटर केंद्र माना जाता है। इजराइल ने आज तक ना तो स्वीकार किया है कि डिमोना में उसकी न्यूक्लियर साइट ना और है और ना ही इन दावों का कभी खंडन किया है। लेकिन सिप्री की नई रिपोर्ट कहती है कि इजराइल के पास 90 परमाणु हथियार हो सकते हैं। यह भी दावा है कि इजराइल ने अपने रेगिस्तानी इलाकों में इन परमाणु हथियारों को छिपा कर रखा है जिसे नेगेव डेजर्ट एरिया भी कहते हैं।

और खतरनाक बात यह है कि अभी पूरा इजराइल ईरान की मिसाइल रेंज में आता है। और अगर ईरान यह कह रहा है कि वो इजराइल की न्यूक्लियर साइट को निशाना बनाने से पीछे नहीं हटेगा तो इस धमकी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इस तरह की एक भी घटना इस युद्ध को खतरनाक मोड़ दे सकती है। खतरनाक रूप से भड़का सकती है और इजराइल भी ईरान पर बड़ा हमला कर सकता है।

इस युद्ध में आप लगातार अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए और इजराइल की खुफिया एजेंसी मुसाद के बारे में सुन रहे होंगे। लेकिन क्या आपको पता है कि ईरान की खुफिया एजेंसी का नाम क्या है? और इस ईरान की खुफिया एजेंसी ने कैसे इजराइल और अमेरिका को इस युद्ध में परेशान कर दिया है। एक दिन पहले ईरान ने क़तर में अमेरिका के सबसे बड़े रडार सिस्टम को निशाना बनाया।

इस रडार सिस्टम को एएन एफपीएस 132 या बलिस्टिक मिसाइल अर्ली वार्निंग रडार सिस्टम कहते हैं। और भी सरल शब्दों में कहें तो यह अमेरिका की आंख है जो ईरान से आने वाली बलिस्टिक मिसाइलों पर नजर रखती है। यह रडार सिस्टम इतना आधुनिक है कि ईरान जब किसी भी ठिकाने से बैलेस्टिक मिसाइल को हमले के लिए लॉन्च करता है तो ये रडार सिस्टम को उसकी पहचान करके वार्निंग सिग्नल देने लगता है। और इस तरह अमेरिका के लिए ईरान की ज्यादा से ज्यादा मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करना आसान हो जाता है।

लेकिन एक दिन पहले ईरान के शाहिद ड्रोन ने इस रडार सिस्टम को नष्ट कर दिया और द न्यूयॉर्क टाइम्स ने जो सेटेलाइट तस्वीरें जारी की हैं उनमें साफ दिख रहा है कि कतर के अल उदैद एयरबेस के पास इस रडार सिस्टम को काफी नुकसान पहुंचा है। और अब अमेरिका के लिए ईरान की बलिस्टिक मिसाइलों को रोकना यहां पर मुश्किल हो सकता है। हैरानी की बात यह है कि अमेरिका का यह रडार सिस्टम 1.1 बिलियन डॉलर यानी लगभग ₹9000 करोड़ का था। लेकिन ईरान ने अपने सिर्फ ₹40 लाख के शाहिद ड्रोन से इस ₹9000 करोड़ के अमेरिकी रडार सिस्टम को नष्ट कर दिया है। और ऐसा इसलिए मुमकिन हो पाया क्योंकि ईरान की खुफिया एजेंसी के पास अमेरिका के गोपनीय सैन्य ठिकानों की पूरी जानकारी थी।

ईरान ने कतर के साथ बहरेन के कम्युनिकेशन सिस्टम, कुवैत के रडार डोम, सऊदी अरब के भी रडार डोम और यूएई के एन टीपीवाई टू रडार सिस्टम को निशाना बनाया है जो ईरान की बलिस्टिक मिसाइलों को रोकने का काम कर रहे थे। और इससे आपको यह भी पता चलेगा कि इस युद्ध में ईरान की खुफिया एजेंसी भी पीछे नहीं रही है। इस खुफिया एजेंसी का नाम है विज़ारत इत्तलात जिसे अंग्रेजी में मिनिस्ट्री ऑफ इंटेलिजेंस इन सिक्योरिटी भी कहते हैं।

ईरान की इसी खुफिया एजेंसी ने अमेरिका की इस गलतफहमी को दूर कर दिया कि उसके मिडिल ईस्ट में मौजूद गोपनीय ठिकानों का ईरान को पता ही नहीं लग पाएगा। आज ईरान ने ना सिर्फ अमेरिका की आंख माने जाने वाले उसके सबसे इंपॉर्टेंट रडार सिस्टम पर हमले किए हैं बल्कि हजारों करोड़ रुपए के इन रडार सिस्टम्स को अपने ₹ लाख 40 लाख के शायद ड्रोन से निशाना बनाया।

यह युद्ध पूरी तरह मिसाइलों और आत्मघाती ड्रोन से लड़ा जा रहा है। जिस देश के पास जितनी ज्यादा और ताकतवर मिसाइलें या कामकाजी ड्रोंस होंगे वो उतना ही ताकतवर माना जाएगा। आपने देखा होगा कि आज युद्ध का छठा दिन है और अभी तक अमेरिका, इजराइल, ईरान एक दूसरे पर ज्यादातर हमले मिसाइल्स और ड्रोन से कर रहे हैं। युद्ध जितना लंबा खींचेगा तीनों देशों की मिसाइल शक्ति तय करेगी कि युद्ध में जीत किसकी हो रही है।

जहां तक मिसाइल क्षमता की बात है तो अमेरिका उन देशों में है जिनके पास ऐसी मिसाइलें हैं जो दुनिया के किसी भी कोने में हमला कर सकती हैं। दुनिया केवल पांच देश अमेरिका, चाइना, रशिया, फ्रांस, ब्रिटेन ऐसे हैं जिनके पास दुनिया के किसी शहर पर हमला करने वाली मिसाइल नहीं। अमेरिका के पास न्यूक्लियर बलिस्टिक क्रूज और टैक्टिकल सभी तरह की मिसाइल्स हैं। यहां आपको यह बताना जरूरी है

कि रणनीतिक रूप से कोई भी देश अपने मिसाइल्स की संख्या सार्वजनिक नहीं करता। लेकिन अनुमान है कि अमेरिका के पास 400 से ज्यादा आईसीबीएम, 250 से ज्यादा सबमरीन, बुलिस्टिक मिसाइल्स, 4000 से ज्यादा टॉमक जैसी क्रूज मिसाइल्स और हजारों की संख्या में टैक्टिकल मिसाइल्स हैं। इस युद्ध में ईरान के मुकाबले अमेरिका पानी की तरह पैसा बहा रहा है। व्यावहारिक सच यही है कि युद्ध में जीत उसी की होती है जो पैसा खर्च करता है।

लेकिन अमेरिका ने ईरान पर सबसे ज्यादा हमले टॉमहॉक मिसाइल से किए हैं। टॉमहॉक अमेरिका की ट्रायल एंड ट्राइड एंड टेस्टेड मिसाइल है जिसका इस्तेमाल उसने कई युद्ध में अभी तक किया है। एक टॉमहॉक मिसाइल को बनने में ₹20 करोड़ लगते हैं और अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड के मुताबिक उन्होंने ईरान पर ₹00 से ज्यादा बॉम्ब्स गिराए हैं। जिसमें 100 से ज्यादा हमले टॉमहॉक से किए गए।

यानी अमेरिका अब तक करीब ₹2000 करोड़ की टॉमहॉक मिसाइल्स ही ईरान पर दाग चुका है। अमेरिका सालाना करीब 100 टॉमहॉक मिसाइल बना रहा है और इसकी क्षमता को000 तक लाने की तैयारी चल रही है। ईरान इस युद्ध में अब तक 1000 मिसाइल हमले कर चुका है। जिससे बचने के लिए अमेरिका अपने एयर डिफेंस सिस्टम की पेट्रिएट मिसाइल का खूब इस्तेमाल कर रहा है।

एक पेट्रिएट मिसाइल को बनाने में ₹35 करोड़ खर्च होते हैं। किसी हवाई खतरे से निपटने के लिए अमेरिकी एयर डिफेंस दो पेट्रिएट मिसाइल से हमला करता है। यानी एक टारगेट को खत्म करने के लिए अमेरिका करीब 70 करोड़ एक बार में खर्च कर रहा है। अमेरिका हर साल करीब 700 पेट्रिएट मिसाइल्स बनाता है। यानी आप सोचिए कि हर महीने करीब 60 मिसाइल्स हैं। थिंक टैंक सीएसआईएस का अनुमान है कि अमेरिका के पास करीब 1600 पेट्रिएट मिसाइल्स हैं। जहां तक ईरान की बात है तो मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान के पास 2000 से 2500 कि.मी.


तक हमला करने वाली बलिस्टिक, क्रूज और हाइपरसोनिक मिसाइल्स हैं। जिनकी संख्या 3200 से कुछ ज्यादा बताई जाती है। मध्यपूर्व के देशों में ईरान एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास बड़ी संख्या में मिसाइलें हैं। लेकिन फिर भी उसके आत्मघाती शाहिद ड्रोंस उसके हमलों की बैकबोन है। शायद 136 ड्रोंस ने अभी तक ईरान को इस युद्ध में बनाए रखा है। ड्रोन हमलों के दम पर ही ईरान ने मिडिल ईस्ट के अमेरिकी दोस्तों को खूब परेशान किया है। ईरान अपने ज्यादातर हमले शाहिद 136 ड्रोन से कर रहा है।

एक शाहिद ड्रोन को बनाने में ईरान ₹40 लाख खर्च करता है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान हर दिन 200 से ज्यादा तो शाहिद ड्रोंस बना रहा है। युद्ध के शुरुआती पांच दिनों में ही ईरान ने 2000 से ज्यादा शाही ड्रोंस का इस्तेमाल किया। ईरान के पास कितने शाही ड्रोंस हैं? इसकी जानकारी सामने नहीं आई है। लेकिन माना जा रहा है कि उसके पास बड़ी संख्या में शाहिद ड्रोंस हैं और शायद इसीलिए वो ज्यादातर हमले शाहिद के जरिए ही कर रहा है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि युद्ध के शुरुआती दो दिनों में ईरान की ओर से जितनी मिसाइलें और ड्रोन से हमले किए गए थे

आज उसमें करीब 70% की कमी आई है। माना जा रहा है कि ईरान के हथियारों का जखीरा कम हुआ। ईरान के खिलाफ ऑपरेशन एपिक फ्यूरी को लेकर अमेरिका को उसके एक नेटो साथी ने धोखा दे दिया है। स्पेन ने युद्ध में अमेरिका का साथ देने से इंकार कर दिया। स्पेन ने अमेरिका को अपने सैन्य बेस इस्तेमाल करने से भी रोक दिया है। स्पेन का कहना है कि उनका देश ईरान के खिलाफ हो रहे युद्ध में अमेरिका का पक्ष नहीं लेना चाहता। ईरान के खिलाफ युद्ध की शुरुआत के बाद से ही स्पेन इसको गलत और खतरनाक बता रहा है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सेंचेस ने अमेरिका को इस युद्ध में स्पेन की जमीन इस्तेमाल ना करने के लिए कहा है क्योंकि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी अंतरराष्ट्रीय कानूनों और यूएन की मंजूरी के बिना शुरू किया गया है। स्पेन मानता है कि अगर वह अमेरिका का साथ देता है

तो वह भी इस युद्ध का हिस्सा बन जाएगा। ईरान उस पर भी हमला करने से नहीं चूकेगा। ऐसी स्थिति में उसके नागरिकों की सुरक्षा खतरे में होगी। स्पेन सरकार का मानना है कि अगर उसकी सेना युद्ध के मैदान में उतरी तो युद्ध मिडिल ईस्ट में और ज्यादा भयानक हो जाएगा। स्पेन का यह रुख अमेरिका के लिए बड़ा झटका है क्योंकि मिडिल ईस्ट के अपने सैन्य ऑपरेशंस में स्पेन के दो सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल वो हमेशा से करता रहा है। स्पेन के दो सैन्य ठिकाने रोटा नेवल बेस और मोरोन एयरबेस को अमेरिका अपने सैन्य ऑपरेशंस के दौरान इस्तेमाल करता है। एक तरह से यह सैन्य ठिकाने अमेरिका और स्पेन संयुक्त रूप से इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इस बार स्पेन ने अमेरिका को इसका इस्तेमाल करने से मना कर दिया है। तो आइए आपको दिखाते हैं ये देखिए ये दोनों जो अमेरिका के लिए अहम सैन्य ठिकाने हैं। रोटा नेवल बेस क्योंकि अगर आप देखिए तो ये स्पेन के ये जो नेवल बेसेस है वो स्ट्रिजिकली उसके काम आते हैं

अमेरिका के जब उसको ईरान में हमला करना होता है। अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए वो इसको इस्तेमाल करता है। लेकिन अगर स्पेन इंकार कर दे और ये है मोरोन एयरबेस जिसका वो इस्तेमाल करता है सीधा इधर से ईरान की तरफ जाने में। लेकिन वहीं पर स्पेन अगर इंकार कर रहा है तो उसको अमेरिका के लिए बड़ा झटका माना जाएगा और ये दोनों ही चाहे वो नेवल बेस हो एयरबेस हो ये देखिए ये दोनों में ही आप देख रहे हैं कि ये खतरनाक बन सकता है उनके लिए और क्योंकि ये इंपॉर्टेंट बेसिस उनको अब नहीं मिलेगा। तो ये दोनों सैन्य ठिकाने जो हैं वो रणनीतिक रूप से बहुत बड़े हैं। अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण है और अगर उसे ये सैन्य ठिकाने नहीं मिले तो ईरान के खिलाफ उसका सैन्य ऑपरेशन उम्मीद से ज्यादा खर्चीला और जोखिम भरा होगा। दरअसल अमेरिकी सेना स्पेन के दोनों सैन्य ठिकानों को ट्रांजिट हब की तरह इस्तेमाल करती रही है।

स्पेन के सैन्य ठिकाने नहीं मिलने पर अमेरिकी सेना के लिए ईरान पर हमला करने की दूरी, समय और लागत तीनों बढ़ जाएंगे। अमेरिकी फाइटर जेट्स को अमेरिका से ही उड़ान भर के ईरान पर हमला करने आना होगा। अब तक मिडिल ईस्ट पर हमला करने के लिए स्पेन के सैन्य बेस का इस्तेमाल किया जाता था। जिससे मिडिल ईस्ट पर हमला करना अमेरिका के लिए आसान था और वह तेजी से पलटवार कर पाता था। स्पेन के सैन्य बेस का इस्तेमाल केसी 135 टैंकर विमानों के लिए भी किया जाता था। यह विमान अमेरिकी फाइटर जेट्स को हवा में रिफल करते हैं।

सैन्य बेस का इस्तेमाल बंद होने से टैंकर विमान अमेरिकी फाइटर जेट की मदद नहीं कर पाएंगे। अमेरिका को युद्ध जारी रखने के लिए टैंकर विमानों की संख्या बढ़ानी पड़ेगी और उन्हें भी लंबी दूरी तय करके मिडिल ईस्ट तक आना होगा। ऐसी स्थिति में ईरान युद्ध अमेरिका के लिए पेचीदा खर्चीला होगा। स्पेन के फैसले के बाद अमेरिका ने 12 से ज्यादा केसी 135 टैंकर विमान को वापस अमेरिका बुला लिया है। स्पेन के सैन्य बेस नहीं मिले तो अमेरिकी नौसेना को लॉजिस्टिक सपोर्ट नहीं मिलेगा। यानी यूएस नेवी को ईंधन, हथियार, मेंटेनेंस, क्रू बदलने जैसी जो सुविधाएं हैं वो नहीं मिलेंगी। जिससे अमेरिकी नेवी के लिए युद्ध लड़ना मुश्किल होगा। नेवी को दूर के सैन्य बेस से आने वाले जहाजों पर निर्भर रहना होगा। यही वजह है कि ईरान युद्ध के लिए स्पेन ने जैसे ही अपने सैन्य बेस के इस्तेमाल से इंकार किया

अमेरिका बिफर गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉन ट्रंप ने स्पेन को व्यापार बंद करने की धमकी दे डाली। उनका कहना है कि अगर इस युद्ध में स्पेन ने अपने सैन्य ठिकाने इस्तेमाल नहीं करने दिए तो अमेरिका स्पेन के साथ अपने सारे व्यापारिक संबंध खत्म कर लेगा। इस धमकी के बाद अमेरिका यह मान रहा था कि स्पेन उसके दबाव में आएगा। लेकिन स्पेन ने फिर से यह बात साफ कर दी है कि ईरान युद्ध में वो स्पेन की जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देगा। स्पेन बीन टेरेबल इनफ आई टोल्ड स्कॉट टू कट ऑफ डीलिंग स्पेन स्पेन फर्स्ट ऑफ़ इट स्टार्टेड यूरोपियन नेशन रिक्वेस्ट 5% शुड बीबडी वा अबाउट जर्मनीवरी स्पेन स्पेन एक्चुअली देव देली एंड सो आई टोल्ड वी स्पेन अब्सोलुटली नथिंग वी नीड अदर देन ग्रेट पीपल देव ग्रेट पीपल स्पेन साफ इंकार कर रहा है ट्रंप की धमकियों के बावजूद देखिए युद्ध युद्ध आगे कैसे बढ़ता है?

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