मोहम्मद रफी साहब को भला कौन नहीं जानता आपने भी उनके गाने जरूर सुने हैं और शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जिन्होंने उनके गाने ना सुने हो हजारों रंग के नजारे बन गए मोहम्मद रफी साहब जिनकी आवाज में जादू था हर डायरेक्टर चाहता था कि उनकी फिल्मों में मोहम्मद रफी गाने गाए हर अभिनेता और अभिनेत्री चाहती थी कि मोहम्मद रफी की आवाज उनकी फिल्मों में हो अगर एक भी गाना मोहम्मद रफी का आया तो उनकी फिल्में हिट हो जाएंगी चाहे प्रेम का अलह हो दिल टूटने का दर्द हो प्रेमिका से इजहार मोहब्बत हो
या सिर्फ उसके हुस्न की तारीफ हो मोहम्मद रफी साहब का कोई सानी नहीं था मोहब्बत ही नहीं इंसानी जज्बात के जितने भी पहलू हो सकते थे दुख खुशी आस्था या देशभक्ति या फिर गायकी का कोई भी रूप हो भजन कौवाली लोकगीत शास्त्रीय संगीत या गजल मोहम्मद रफी ने गायकी में सभी भावनाओं को बखूबी निभाया यह सच है कि मोहम्मद रफी साहब जैसा नकार ना कभी हुआ और ना कभी होगा दोस्तों मोहम्मद रफी साहब से जुड़े इतने किस्से मशहूर हैं जिसे बता पाना इस एक वीडियो में नाकाफी होगा आज के इस वीडियो में हम आपको एक ऐसे ही किस्से के बारे में बताएंगे जिसे जानकर आप भाव विभोर हो जाएंगे तो चलिए जानते हैं उस किस्से के बारे में जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कहना पड़ा रफी अब चुप भी हो जाओ
अब मैं एक शब्द भी बर्दाश्त नहीं कर सकती आखिर रफी साहब ने ने ऐसा क्या कर दिया था दोस्तों आर के बैनर तले एक फिल्म प्लान हुई फिल्म का नाम था अब दिल्ली दूर नहीं फिल्म की स्टोरी कुछ यूं है इस फिल्म में एक बच्चा अपने पिता की फांसी को टालने के लिए प्रधानमंत्री से मिलने के लिए चल पड़ता है प्रोड्यूसर राज कपूर साहब को अच्छी तरह से पता था कि प्रधानमंत्री चाचा नेहरू बच्चों से बहुत प्यार करते हैं तो उनके मन में एक विचार आया क्यों ना इस फिल्म में प्रधानमंत्री के कैरेक्टर के लिए असल प्रधानमंत्री को ही दिखा दिया जाए
उन्होंने प्रधानमंत्री से मुलाकात की और आग्रह किया कि इस फिल्म में वह कुछ मिनट के लिए ही सही बच्चों के खातिर ही सही छोटे से रोल को करने के लिए हां कह दें तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उस फिल्म में प्रधानमंत्री का रोल करने के लिए मान भी गए थे पर कुछ ही दिनों के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से राज कपूर साहब के पास एक पत्र के जरिए खबर आई उसमें लिखा हुआ था कि किसी देश के प्रधानमंत्री को किसी फिल्म में काम करते देखना पूरी दुनिया में गलत मैसेज जाएगा लोग कहेंगे कि अपने चुनावी प्रचार के खातिर एक प्रधानमंत्री ने फिल्म में काम किया इधर एक तरह से राज कपूर साहब का सपना अधूरा रह गया मगर असल कहानी की शुरुआत तो अब यहीं से शुरू होती है 27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का देहांत हो जाता है
पूरे देश में शोक का माहौल था बच्चे बूढ़े जवान सभी बहुत दुखी थे हिंदी सिनेमा को गोमती के किनारे जैसी ऑल टाइम क्लासिकल फिल्म देने वाले सावन कुमार टाक भी पंडित जवाहरलाल नेहरू के बहुत बड़े प्रशंसक हुआ करते थे सावन कुमार के मन में अब दिल्ली दूर नहीं फिल्म के विचार से ही एक और विचार आया उन्होंने सोचा क्यों ना अपने आदर्श पंडित जवाहरलाल नेहरू को ध्यान में रखकर एक फिल्म बनाई जाए जिसमें एक बच्चे के माध्यम से नेहरू जी के प्रति संपूर्ण भारत को एक संदेश दिया जाए देश के चुनिंदा कलाकारों को इकट्ठा किया गया और फिल्म बनाई गई फिल्म की कहानी में कुछ यूं था कि एक बेसहारा बच्चे को एक विद्यालय के प्रधानाचार्य गोद ले लेते हैं
उसे बहलाने के लिए उसे बताया जाता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू उनके रिश्तेदार हैं बच्चे के मन में यह बात घर कर जाती है और बच्चा राजू जो कि अकेले ही अपने चाचा नेहरू से मिलने के लिए दिल्ली निकल पड़ता है पर जब वह कठिना से गुजरता हुआ चाचा नेहरू के पास पहुंचता है तो उसे पता लगता है कि चाचा नेहरू का निधन हो गया है फिल्म नौनिहाल की तैयारियां होने लगी फिल्म के साथ-साथ उस फिल्म में नेहरू जी पर ही डेडिकेट एक गाने की भी बात हुई सावन कुमार टाक जी ने इस मुश्किल काम को करने का जिम्मा उस समय के मशहूर शायर कैफी आजमी साहब को दिया और कैफी आजमी ने यह गीत बनाया मेरी आवाज सुनो प्यार के राज सुनो जब सावन कुमार साहब ने यह गीत पढ़ा तो उनके मुंह से सिर्फ एक ही नाम आया इस गीत को अगर कोई गाएगा तो वह होंगे मोहम्मद रफी साहब कुछ ही दिनों में नौ निहाल फिल्म बनकर तैयार हुई
और वर्ष 1967 में यह फिल्म पर्दे पर भी प्रदर्शित हुई एक ऐसे अनाथ बच्चे की कहानी जिसे यह पता होता है कि पंडित नेहरू उसके रिश्ते में चाचा लगते हैं और यह छोटा सा बच्चा अपने चाचा नेहरू से मिलने के लिए दिल्ली निकल पड़ता है इस फिल्म की कहानी पंडित जवाहरलाल नेहरू के जनाजे पर खत्म होती है फिल्म जब पर्दे पर आई तो एक बहुत बड़ी हिट साबित हुई फिल्म के सक्सेस को देखते हुए फिल्म के डायरेक्टर राज माथुर और प्रोड्यूसर सावन कुमार ने कहा क्यों ना हम भारत सरकार से आग्रह करें कि इस फिल्म को पूरे भारत में टैक्स फ्री कर दिया जाए पूरी टीम के मन में यह विचार आया कि उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री से क्यों ना मिला जाए और उनसे ही आग्रह किया जाए कि यह फिल्म उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू पर समर्पित है और इसे वह पूरे भारत में टैक्स फ्री कर दें पर उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलना कोई छोटी बात नहीं थी
उस समय फिल्म इंडस्ट्री में सावन कुमार कोई बड़ा नाम भी नहीं थे तब सावन कुमार साहब ने अपनी ही फिल्म में कैरेक्टर रोल करने वाले हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय से मदद ली व वैसे तो हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय पेशे से एक शायर और शौकिया तौर पर एक एक्टर हुआ करते थे उनके इंदिरा गांधी से बहुत अच्छे संबंध थे हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय मशहूर कांग्रेस नेता सरोजिनी नायडू के छोटे भाई थे हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय के नजदीकी संबंधों के बदौलत प्रोड्यूसर सावन कुमार डायरेक्टर राजकुमार बोस और म्यूजिक डायरेक्टर मदन मोहन ने इंदिरा गांधी से मुलाकात की और उन सभी ने मिल यह आग्रह किया कि मैडम क्यों ना इस फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया जाए इंदिरा गांधी जी एक मिनट तक सोचती रही और कहा ठीक है
मैं इस पर विचार करती हूं सावन कुमार को लगा कि इंदिरा गांधी जी ने बात को टाल दिया है वह झट से बोले मैडम एक बार आप इस फिल्म को देख लीजिए फिर आप जैसा चाहे वैसा विचार करिएगा इंदिरा गांधी जी ने कहा मगर मेरे पास घंटे दो घंटे का समय नहीं है तभी पास बैठे म्यूजिक डायरेक्टर मदन मोहन ने कहा कि मैडम आप सही कह रही हैं आपका समय बहुत कीमती है पर आप सिर्फ 5 मिनट का समय तो दे सकती हैं सिर्फ आप इस फिल्म के एक गाने को ही सुन लीजिए जो गाना पंडित नेहरू जी को ही समर्पित है इंदिरा गांधी मुस्कुराए और गाने सुनने के लिए राजी हो गई गाने को बजाया गया मेरी आवाज सुनो मेरी आवाज सुनो रफी साहब ने इस गाने को अपनी कोमल आवाज में इतने दर्द भरे अंदाज में गाया कि इंदिरा गांधी जी इस गाने को सुनने में मंत्रम मुग्ध हो गई उनकी आंखें अपने आप सुनते सुनते बंद हो गई इस गाने को खत्म होते-होते इंदिरा गांधी के चेहरे पर भावनाएं साफ-साफ दिख रही थी
उन्होंने अपने चेहरे पर सभी के सामने हाथ रखते हुए कहा कि रफी साहब अब चुप हो जाइए मैं अब बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी यह कहते हुए वे उठी और अपने प्राइवेट केबिन में चली गई शायद यह भावनाएं भारत के प्रधानमंत्री के साथ-साथ एक बेटी की भी थी जो अपने पिता को याद कर फूट फूट कर रो रही थी बाहर सावन कुमार हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय म्यूजिक कंपोजर मदन मोहन सभी बैठे हुए थे क्योंकि उन्होंने इस दृश्य की कल्पना नहीं की थी कुछ देर के बाद इंदिरा जी के सेक्रेटरी बाहर आए उन्होंने कहा कि आप जाइए आपका काम हो जाएगा अगले दिन भारत सरकार ने फिल्म नौ निहाल को पूरे देश में टैक्स फ्री कर दिया तो ऐसे थे हमारे मोहम्मद रफी साहब जिसने देश के सब से प्रखर प्रधानमंत्री से वह करवा लिया जो शायद सावन कुमार जैसे प्रोड्यूसर डायरेक्टर कभी करवा ही नहीं सकते थे आपको मोहम्मद रफी साहब की आवाज कैसी लगती है आप कमेंट करके जरूर बताएं