रुक जा रात ठहर जा रे चंदा बीते आज यह दास्तान है भारतीय हिंदी सिनेमा के गुजरे सुनहरे दौर की एक ऐसी अभिनेत्री की जो अपनी नायाब खूबसूरती और दिलकश आवाज के दम पर हिंदी सिनेमा के इतिहास में हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गई। अजीब दास्ता है ये कहां शुरू हिंदी सिनेमा के इतिहास की वो यादगार अमर अदाकारा जिसके लिए बना हिंदी सिनेमा का सर्वश्रेष्ठ अवार्ड इन्हीं लोगों ने इन्हीं लोगों ने ले ला एक ऐसी महान अभिनेत्री जिसने हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय और खूबसूरती के दम पर फिल्म निर्माता और अभिनेताओं के बीच लगाई वो आग की ज्वाला कि बड़े-बड़े अभिनेता और फिल्म निर्माता लड़ने लगे थे इनको अपनी-अपनी फिल्मों में लेने को लेकर। छू लेने दो नाजुक होठों को कुछ और दोस्तों जिस अभिनेत्री की एक झलक पाने के लिए लोग लगाते थे
पिक्चर हॉल और उनके घर के आगे एक लंबी लाइन उस अभिनेत्री के साथ ऐसा क्या हुआ था कि बचपन में ही इनके सगे पिता ने किया इनके ऊपर वो जुल्म कि इनको मारने के इरादे से छोड़ आए आए थे अनाथ आश्रम की सीढ़ियों पर और कैसे उसी अनाथ आश्रम में इस नवजात बच्ची को खा गई सैकड़ों चींटियां। दोस्तों और क्या आप यह जानते हैं कि इस अभिनेत्री के पिता ने इनका पूरा बचपन और जवानी अपने पैरों तले रौंदते हुए इनको बना दिया था अपने लालच और पैसे कमाने की दर्द भरी मशीन। इससे तो अच्छा होता कि तू मुझे दहर देके मार डाल।
बाबा बाबा मर गया क्या बाबा। और कैसे बचपन और नाबालिक उम्र में मिले अपनों के दुख और धोखों ने बना दिया इस अदाकारा को हिंदी सिनेमा की आज तक की सबसे बड़ी लाचार ट्रेजडी क्वीन। अगर आपको अभी विश्वास नहीं आता तो लीजिए। मैं अपने साथ की आपके बेटे की ही सौगंध खाकर कहती हूं कि मैं चुप रहूंगी। जिंदगी भर चुप रहूं। और दोस्तों क्या आप यह भी जानते हैं इस अभिनेत्री के बारे में कि कैसे इस अदाकारा को हिंदी सिनेमा के अधी उम्र के पहले से शादीशुदा और तीन बच्चों के पिता से हो गया था नाजायज प्यार सैया छुड़ा के मैया कसम और क्यों उसी प्यार को पाने के लिए इस अभिनेत्री को सबकी निगाहों से छुपकर घर से चोरी छिपे भागकर करना पड़ा था
निकाह। मैं हवन कुंड की आग में पुराने सारे रिश्ते नाते जलाकर आ गई हूं। अब अब आप ही मेरे भगवान हैं। और कैसे आगे चलकर इसे निकाह में इस अभिनेत्री को झेलना पड़ा गर्भपात, हलाला और तलाक का वो बेरहम सच और दर्द जिसकी वजह से यह अदाकारा डूब गई। बेबसी लाचारी की उस दुनिया में जहां से आज तक लौट कर नहीं आ पाई है यह बदनसीब बेऔलाद मां। दोस्तों हिंदुस्तान के हिंदी सिनेमा में अभिनय की नई किताब और इतिहास बनाने वाली इस खूबसूरत अभिनेत्री का क्यों होता रहा कई सालों तक शारीरिक शोषण और इसी शोषण के दर्द को भुलाने के लिए यह अभिनेत्री लेने लगी नींद की गोलियां और पीने लगी बेहिसब शराब और कैसे आगे चलकर कर यही शराब बन गई
इस अदाकारा की जिंदगी का कड़वा सच। इधर लाओ गिलास पंगी पंगी। दोस्तों और क्या आप यह भी जानते हैं कि इस अभिनेत्री के अभिनय का पूरी दुनिया में वो जलवा था कि इस अभिनेत्री को असल जिंदगी में उठाकर ले गए थे खतरनाक डाकू। और कैसे उसे खूंखार प्रेमी डाकू के हाथ पर लिख दिया गया था इस अभिनेत्री ने उसी के चाकू से गोद अपना नाम। तुम्हें मेरी जान की कसम है परवेज अपना फैसला बदल दूं। मैं यह सोच भी नहीं सकती कि तुम्हारे गले में जल्लाद की तलवार हो। जिंदगी भर पिता और पति के लिए दुख दर्द झेलने वाली इस अभिनेत्री की कैसे एक फिल्म के सेट पर लिखी असल जिंदगी की मौत की कहानी और क्यों मरने के बाद सिनेमाघरों में चलाई गई थी
इस अभिनेत्री की फिल्म जब मैं मर जाऊं तो खूब सजाना मुझे सुना खूब सजाना और मांग मांग मांग सिंदूर से भर देना रे। बताएंगे आपको और भी बहुत कुछ इस बेऔलाद और बदकिस्मत अभिनेत्री की दर्दनाक जिंदगी के बारे में वो सच जिसे सुनकर आप सभी की आंखें हो जाएंगी नम। तो पूरा सच जानने के लिए आप बने रहिए हमारे साथ इस वीडियो के अंत तक। आज तक भगवान के सहारे ही तो जीती रही हूं। इंसानों ने तो सदा ठुकराया ही। नमस्कार, आदाब आभार दोस्तों, आज हम अपने इस शो में बात करने जा रहे हैं उस अभिनेत्री की जिसको हिंदी सिनेमा में बड़े अदब और सम्मान के साथ आज तक याद किया जाता है।
बचपन से लेकर मरते दम तक दुख, दर्द की किताब बनी इस अदाकारा को, जहां पूरी दुनिया ने कहा, “ट्रैजेडी क्वीन।” तो किसी ने इनको जाना मीना मंजू या फिर शायराना नाज़ के नाम से। लेकिन जिंदगी और इतिहास के पन्नों में यह जानी गई हिंदी सिनेमा की नायाब खूबसूरत मीना कुमारी के नाम से। चलते चलते यूं ही कोई मिल गया था। यूं ही कौन थी मीना कुमारी? कहां से यह आई थी?
क्या थे इनकी जिंदगी के राज और कड़वे सच यह सब मैं आपको बताऊंगी लेकिन उससे पहले जान लेते हैं मीना कुमारी के शुरुआती जीवन परिवार और पढ़ाई लिखाई के बारे में हमसफर मेरे हमसफर पंख तुम पर नमस्कार आप सभी का स्वागत है बॉलीवुड नवेल के इस एपिसोड में ये दामन अब ना छूटेगा कभी। मीना कुमारी का जन्म 1 अगस्त साल 1933 को मुंबई में हुआ था। इनका असली नाम था महजबीन बानो। इनके पिता का नाम था अली बख्श। तो इनकी मां का नाम इकबाल बानो। मीना कुमारी की दो बहनें भी थी। एक बहन इनसे बड़ी थी
जिसका नाम था खुर्शीद और दूसरी इनसे छोटी थी जिनका नाम था मधु। इनके पिता अली बख्श पाकिस्तान के एक छोटे से गांव बहेड़ा के रहने वाले थे। बचपन से ही संगीत का शौक था अली बख्श को। बड़े होते-होते हारमोनियम बजाने के साथ-साथ गांव के गीतों को भी वो कंपोज करने लगे और इस वजह से आसपास के लोग अली बख्श को मास्टर जी कहकर बुलाने लगे। अली बख्श का निकाह बेहद कम उम्र में ही हो गया था। अली बख्श अपने संगीत के सफर को आगे बढ़ाना चाहते थे। लेकिन गांव में रहकर यह सब भला कहां मुमकिन था। इसीलिए साल 1924 में अली बख्श अपनी पत्नी और तीनों बच्चों को छोड़कर दिल्ली आ गए। अली बख्श दिल्ली तो आ गए थे।
लेकिन गुजर बसर के लिए ज्यादा पैसे नहीं थे। काफी कोशिश और मेहनत के बाद उनको थिएटर में नौकरी मिल गई और यह नौकरी थी हारमोनियम बजाने की। नौकरी मिलते ही अली बख्श का इरादा पक्का हो गया मुंबई में ही रहने का। उन्हीं दिनों उसी थिएटर कंपनी में अली बख्श की मुलाकात हुई कामिनी नाम की एक डांसर से। कामिनी का असली नाम था प्रभावती। प्रभावती और अली बख्श उसी वक्त एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो रहे थे और फिर इन दोनों ने शादी कर ली। प्रभावती इस शादी के बाद बनी इकबाल बानो और इनके जो बच्ची हुई उनका नाम था मीना कुमारी। जब मीना कुमारी पैदा हुई थी तो उनके पिता अली बख्श इस बच्ची से बिल्कुल भी खुश नहीं थे।
क्योंकि इससे पहले एक लड़की खुर्शीद नाम से पैदा हो चुकी थी। वह दूसरे बच्चे के रूप में एक लड़का चाहते थे। लेकिन लड़की होने की वजह से बहुत बुरा लगा था अली बख्श को। उस वक्त अली बख्श की आर्थिक स्थिति भी बिल्कुल ठीक नहीं थी। डॉक्टर की फीस देने तक के पैसे नहीं थे अली बख्श के पास। गुस्से में अली बख्श ने अपनी नवजात बच्ची को अनाथ आश्रम की सीढ़ियों पर छोड़ दिया। बताया जाता है कि जिस वक्त अली बख्श अपनी नवजात बच्ची को इस तरह से मौत के मुंह में धकेल रहे थे उस वक्त बरसात बहुत जोरों पर थी।
अली बख्श ने बच्ची को वहां रखा तो उस बच्ची के कोमल बदन से सैकड़ों चींटियां चिपट गई और जब उन चींटियों ने बच्ची के बदन को काटना शुरू किया तो वो बच्ची दर्द के साथ रोने लगी। बच्चे के रोने की आवाज अली बख्श के कानों में पहुंची तो वो उसे सहन नहीं कर पाए और वह अपनी गलती का एहसास करते हुए उस बच्ची को वापस गोद में उठाते हुए घर वापस ले आए। इसके बाद इस नन्ही सी बच्ची का नाम रखा गया बहजबी और घर में प्यार से बुलाया जाने लगा मुन्ना।
अपने भैया की मैं हूं दुलारी। अपने भैया के महजबी से बड़ी उनकी बहन खुर्शीद अपने पिता अली बख्श के अच्छे ताल्लुकात की वजह से उन दिनों फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम करने लगी थी। तो वहीं अली बख्श को भी दो फिल्मों में संगीत देने का सुनहरा मौका मिला और इनकी पहली फिल्म थी ईद का चांद और दूसरी थी शाही लुटेरे। लेकिन यह सब कुछ घर चलाने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो रहा था। इसीलिए अली बख्श ने बड़ी बेटी खुर्शीद की तरह महजिन को भी फिल्मों में काम कराने का मन बना लिया और वो नन्ही सी महजबीन को लेकर एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो चक्कर लगाने लगे।
हां हां मैं इसे करके दिखाते जाऊंगा। ये मां क्यों वहां क्या करेगी? उन्हीं दिनों प्रकाश स्टूडियो के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर विजय भट्ट एक फिल्म बना रहे थे लेदर फेस। जब अली बख्श ने महजबीन को विजय भट्ट से मिलवाया तो वह नन्ही सी मेहजबीन को देखकर काफी प्रभावित हो गए और अपनी फिल्म लेदर फेस के लिए उनको ले लिया और नन्ही सी मेहजबी को एक फिल्म में काम करने के लिए फीस के तौर पर मिले ₹25 और इस फिल्म से ही मेहजबी का नाम भी बदल गया और अब ये बन गई फिल्मों की बेबी मीना आए बेबी मीना का काम सबको अच्छा भी लगा
और इस फिल्म के बाद कई और फिल्में बाल कलाकार के रूप में नजर आने लगी बेबी मीना। बेबी मीना अभिनय के साथ-साथ गाना भी बहुत अच्छा गाती थी। और पहली बार बेबी मीना ने साल 1941 में बहन फिल्म में एक गीत भी गाया। अपने भैया की मैं हूं दुलारी अपने भैया की मैं हूं। बेबी मीना को हिंदी फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम मिलता चला गया
और इस सब से मीना के पिता अली बख्श अब खुश रहा करते थे। लेकिन इस काम में बेबी मीना का बचपन कहीं खो सा रहा था। वो इन सब से खुश नहीं थी। वो तो बस अपने पिता के कहने पर यह सब कर रही थी। भैया जरा हमें दो पैसे की अंग्रेजी मिठाई ला दो। वाह बिटिया यहां नौकरी पे को बैठी? हम दौड़ के ला दो जब तक हम यहां बैठे हैं। हम यूं नहीं हो सकत। अब नन्ही सी बेबी मीना का पूरा-पूरा दिन स्टूडियो में तेज लाइटों के बीच काम करने में गुजरने लगा। बेबी मीना और बच्चों की तरह खेलना कूदना चाहती थी। लेकिन नन्हे से कंधों पर जिम्मेदारी का बोझ था और इस सब में उनका बचपन पूरी तरह से छीन रहा था। बेबी मीना को पढ़ने लिखने का बड़ा शौक था।
इनका दाखिला भी हुआ स्कूल में लेकिन फिल्मों की शूटिंग को पूरा करने के चक्कर में बेबी मीना स्कूल जा ही नहीं पाई। बेबी मीना अपनी स्कूल की किताबों को लेकर फिल्मों के सेट पर जाया करती और जैसे ही उनको समय मिलता तो वह उनको पढ़ना शुरू कर देती। असली सुंदरता पवित्र आत्मा में होती है। जिन लोगों के विचार और चरित्र सुंदर होते हैं वो अमर होते हैं। बेबी मीना जब महज 6 साल की थी तब उनकी मुलाकात हुई थी कमाल अमरोही से। कमाल अमरोही उस वक्त सोहराब मोदी के लिए काम किया करते थे। उन दिनों फिल्म जेलर के लिए एक छोटी सी लड़की की जरूरत थी। कमाल अमरोही को अली बख्श और बेबी मीना से मिलने का जिम्मा सौंपा गया।
जब अमरोही अली बख्श के घर गए तो वहां उनकी मुलाकात हुई बेबी मीना से। उस वक्त कमाल अमरोही ने यह सोचा भी नहीं होगा कि 6 साल की यह छोटी सी बच्ची आगे चलकर उनकी हमसफर बनेगी। वहीं उन्हीं दिनों पिता अली बख्श ने बेबी मीना को अशोक कुमार से भी मिलवाया था। तब बेबी मीना को देखकर दादा मुनि ने कहा था कि जब आप बड़ी हो जाएंगी तो हमारी हीरोइन जरूर बनना। किसे पता था कि आगे चलकर अशोक कुमार की यह बात सच हो जाएगी। बहरहाल समय गुजरा और बेबी मीना बाल भूमिका निभातेनिभाते आगे चलकर बनी मीना कुमारी।
जिस फिल्म से बेबी मीना मीना कुमारी बनी थी। उस फिल्म का नाम था बच्चों का खेल। यह फिल्म साल 1946 में आई थी। उसी साल मीना कुमारी की दुनिया एक सराय पिया घर आजा बिछड़े बालम जैसी ऐसी कई फिल्में मीना कुमारी की शुरुआती फिल्में रही। अब धीरे-धीरे मीना कुमारी के परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगा। बड़ी बेटी खुर्शीद और मीना कुमारी के बाद अब छोटी बेटी मधु भी फिल्मों में बाल भूमिका निभाने लगी और इस तरह अब अली बख्श की तीनों बेटियां हिंदी सिनेमा का हिस्सा बन गई थी। पैसा ठीक कमाने के बाद अली बख्श अब मीतावाला चोल को छोड़कर चैपलर रोड के एक अच्छे से घर में शिफ्ट हो गए। अली बख्श ने अपने बच्चों के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ काम ही डाल कर रखा था। उनको अपनी बेटियों का खेलना कूदना बिल्कुल पसंद नहीं था।
और अगर कोई उनकी बात नहीं मानता था तो उसको अली बख्श के हाथों मार भी खानी पड़ती थी। और इस मार ने ही मीना के मन में यह बात अच्छे से बैठा दी थी कि वह सिर्फ काम करने के लिए बनी है। स्कूल, हंसीज़ाक जैसे पल उनकी जिंदगी का हिस्सा नहीं थे और इसी कठोर व्यवहार के चलते मासूम सा बचपन काम के तले कहीं दब चुका था। भोला बचपन दुखी जवानी पिता के इस दर्द से थक हारकर मीना अपनी मां के पास जाकर खूब रोया करती और अपनी मां के आंचल में आकर अपना दर्द बयां करके सो जाया करती।
मुझे अपनी गोद में छुपा लो। मुझे अपने दामन में पनाह दो मां मुझे अपने दामन में पनाह। जिस दिन बेटी को मां के दामन में पनाह ना मिली वो दिन कयामत का दिन होगा। मीना कुमारी की मां इकबाल बानो उनकी ताकत थी। लेकिन शायद अब मीना कुमारी की किस्मत में मां का प्यार नहीं लिखा था। इकबाल बानो को फेफड़ों का कैंसर था और 25 मार्च साल 1947 को इकबाल बानो इस दुनिया को अलविदा कह गई। मीना कुमारी के लिए मां का यूं एकदम से अकेले छोड़कर जाना किसी गहरे दर्दनाक सदमे से कम नहीं था। लेकिन भगवान की मर्जी के आगे भला मीना कुमारी भी क्या कर सकती थी। समय गुजरा और अब मीना कुमारी को पौराणिक फिल्मों के ऑफर्स भी आने लगे। मीना ने वीर घटोत्कच, श्री गणेश महिमा, लक्ष्मी नारायण, हनुमान, पाताल, विजय जैसी फिल्मों में बहुत खूबसूरती के साथ किरदार निभाए।
आओ सखी मंगल गाव के शुभ दिन आय रे। एक तरफ पौराणिक फिल्म तो वहीं मल्टीस्टारर और मुख्य भूमिकाओं वाली फिल्मों में मीना कुमारी काम कर रही थी। लेकिन यह सारी की सारी फिल्में मीना कुमारी को सही पहचान अभी तक नहीं दिला पा रही थी। ओ मोहन मुरली वाले राखो लाल मीना कुमारी अब बालिक हो चली थी और अब मीना कुमारी ने एक सेकंड हैंड कार भी खरीद ली थी। मीना को जब भी समय मिलता तो वह मुंबई की सड़कों पर उस कार को लेकर निकल जाती। कहा जाता है कि मीना कुमारी की कार जब सड़कों पर होती थी तो हवा से बातें करती थी। मीना कुमारी को पढ़ने का बेहद शौक था और आगे इसी शौक ने इनको इश्क से भी रूबरू कराया था।
एक दिन एक इंग्लिश मैगजीन को मीना पढ़ रही थी और उस इंग्लिश मैगजीीन में कमाल अमरोही के बारे में कुछ छपा था। उस वक्त कमाल अमरोही की एक फिल्म बहुत बड़ी हिट साबित हुई थी। फिल्म का नाम था महल। आएगा आएगा आने वाला। चारों तरफ कमाल अमरोही की ही चर्चा थी। फिल्म निर्माता के साथ-साथ कमाल अमरोही एक लेखक और कवि भी थे। मीना ने कमाल अमरोही के बारे में सुन तो रखा था लेकिन उस मैगजीन में कमाल अमरोही को देखकर उनको कमाल अमरोही में अपने सपनों का राजकुमार नजर आने लगा। उन दिनों मीना कुमारी अपनी एक फिल्म तमाशा की शूटिंग कर रही थी और इस फिल्म के सेट पर एक दिन पहुंच गए कमाल अमरोही और उनके सेक्रेटरी बाकर। फिल्म के सेट पर अशोक कुमार ने बातों ही बातों में मिलवा दिया मीना कुमारी को कमाल अमरोही से।
लेकिन कमाल अमरोही ने मीना कुमारी पर कोई खास ध्यान नहीं दिया और वापस लौट गए। रास्ते में उनके सेक्रेटरी बाकर ने कहा कि सर हमको इस हीरोइन को ध्यान में रखना चाहिए। ये हमारी फिल्म की हीरोइन बन सकती है। उन्हीं दिनों कमाल अमरोही एक फिल्म के बारे में सोच रहे थे। वह फिल्म थी अनारकली। इस फिल्म के लिए कमल कपूर और मधुबाला को साइन किया जा चुका था। मगर उस वक्त मधुबाला दिलीप कुमार के प्यार में डूबी थी। इसीलिए वो सिर्फ उनके साथ ही काम करना चाहती थी। लिहाजा मधुबाला ने एकदम से इस फिल्म के लिए मना कर दिया।
मधुबाला के इंकार से फिल्म के प्रोड्यूसर्स नाराज हो गए। तो ऐसे में कमाल अमरोही ने प्रोड्यूसरों से वादा कर दिया कि वह कल सुबह एक नई हीरोइन को साथ लेकर स्टूडियो में हाजिर हो जाएंगे। कमाल अमरोही को बाकर की वो बात याद आई मीना कुमारी को लेकर और कमाल अमरोही ने बिल्कुल भी देर ना करते हुए मीना कुमारी के पिता से मुलाकात की और बातचीत के बाद मीना कुमारी को साइन कर लिया। अली बख्श भी बेहद खुश थे कि उनकी बेटी इतने बड़े प्रोजेक्ट की फिल्म का हिस्सा बनने जा रही थी। इधर मीना कुमारी भी बहुत खुश थी
यह सोचकर कि वो पहली बार अपने सपनों के राजकुमार के साथ यानी कमाल अमरोही के साथ काम करने जा रही है। सपनों की दुनिया में सो रही थी मैं। सो रही थी मैं। इस फिल्म के लिए अगले दिन मीना कुमारी 13 मार्च साल 1951 को पहुंच गई फिल्म स्टूडियो जहां फिल्म की फीस के तौर पर मीना कुमारी को मिले ₹15,000 कमाल अमरोही भी हीरोइन मिलने से काफी खुश थे। इसके बाद कमाल अमरोही फिल्म के लिए सही लोकेशन देखने के लिए दिल्ली रवाना हो गए।