LPG और Petrol को लेकर ये है बहोत बड़ी राहत, मोदी ने लगाया गजब का जुगाड़..
ईरान पर अमेरिका और इजराइल के साझा हमले के बाद स्टेट ऑफ होरमुज चर्चा में आ गया है। लेकिन यह स्टेट ऑफ हुरमुज यानी होमज जलदमरू मध्य है क्या? क्यों इसके बंद होने से कई देशों में हाहाकार हो रहा है?
कौन-कौन से देश इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं? दरअसल फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच एक संकरा रास्ता है
महज 33 कि.मी. से 50 कि.मी. चौड़ा। समझ लें चोक पॉइंट है। तो यह जो संकरा रास्ता है वह रणनीतिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यहां से रोजाना लगभग 20 मिलियन बैरल तेल गुजरता है। यानी दुनिया की कुल खपत का तकरीबन 20% इसके साथ ही दुनिया की लगभग 20% लिक्विफाइड नेचुरल गैस भी इसी रास्ते भेजी जाती है। कई देश सीधे तौर पर इस चोक पॉइंट से जुड़े हैं।
भारत और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी इस रास्ते पर निर्भर हैं। ऐसे में इस मार्ग के बंद होने से यहां आर्थिक हालात बिगड़ने का खतरा तो है ही लेकिन इसका असर पूरे यूरोप और अफ्रीका पर भी पड़ सकता है। यह सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और क़तर जैसे बड़े सप्लायर्स के लिए बेहद अहम रास्ता है। चीन इसका सबसे बड़ा खरीदार है। भारत के तेल और गैस की खपत का भी बड़ा हिस्सा इन्हीं खाड़ी देशों से आता है।
मगर होरमज लंबे समय तक बंद रहता है तो सप्लाई रुक सकती है। जिससे आर्थिक स्थिति खराब हो सकती है। इसके अलावा यूरोपीय देशों में भी महंगाई की भारी मार पड़ सकती है। तेल और गैस की सप्लाई रुकने से अरब देशों में भी आर्थिक हालात खराब हो सकते हैं। सऊदी अरब, क़तर, कुवैत और बहरीन जैसे देशों की अर्थव्यवस्थाएं काफी हद तक ऊर्जा निर्यात पर निर्भर हैं।
इस रास्ते के बंद होने की वजह से इन देशों को प्रोडक्शन में कटौती करनी पड़ रही है। क्योंकि उत्पादन होता रहा और सप्लाई नहीं कर पाए तो आर्थिक संकट तो पैदा होगा ही। तेल और गैस को स्टोर करने का संकट अलग से खड़ा होगा। कतर और यूनाइटेड अरब अमीरात के पास स्टेट ऑफ फोरमज के अलावा गैस सप्लाई का कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं है।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक सप्लाई रुकने से दुनिया की गैस सप्लाई में करीब 20% की गिरावट आ सकती है। अगर ऐसा होता है तो वे देश सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे जो कतर और अमीराती गैस पर निर्भर हैं। इसका सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ेगा जहां होरमूज के रास्ते लगभग 90% गैस की सप्लाई होती है।
भारत भी उन एशियाई देशों में शामिल है जो अपनी खपत का 2/3 हिस्सा इन्हीं देशों से आयात करता है। दूसरी तरफ ईरान खाड़ी देशों को निशाना बना रहा है। क्योंकि खाड़ी देशों में अमेरिका की सेना, उसके हथियार और एयरबेस मौजूद हैं। ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर उसके तेल ठिकानों पर और हमले हुए,
तो वह खाड़ी देशों की ऊर्जा सुविधाओं को सीधे-सीधे निशाना बनाएगा। अगर ऐसा होता है तो यह खाड़ी देशों के लिए बड़ी तबाही साबित हो सकता है। हालांकि रूस, चीन, स्पेन, ब्राजील और तुर्की जैसी बड़ी ताकतों ने ईरान पर ट्रंप के हमले का खुलकर विरोध किया है।
इन देशों का कहना है कि गैर कानानूनी सैन्य दखल ईरान के परमाणु या मानवाधिकार मुद्दों का हल नहीं है। उन्हें डर है कि इस युद्ध से बड़े पैमाने पर शरणार्थी संकट पैदा हो सकता है। तेल इंफ्रास्ट्रक्चर नष्ट हो सकता है और मिडिल ईस्ट लंबे समय तक के लिए अस्थिर हो सकता है।



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