शुभांशु शुक्ला पृथ्वी से अंतरिक्ष में कैसे पहुंचेंगे, आ गई पल पल की जानकारी..
थ्री टू वन लिफ्ट ऑफ द [संगीत] 25 जून 2025 दोपहर 12:01 पर वो ऐतिहासिक पल आया जब शुभांशु शुक्ला नासा के कनेडी स्पेस सेंटर से स्पेस एक्स के क्रू ड्रैगन C213 यान के जरिए अंतरिक्ष स्पेस स्टेशन यानी आईएसएस पर कदम रखने की यात्रा पर निकल गए। आइए इस वीडियो में आपको आसान भाषा में समझाते हैं कि कैसे शुभांशु शुक्ला पृथ्वी से अंतरिक्ष में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक पहुंचेंगे। वहां तक उनको पहुंचने में कितना समय लगेगा और उनका यान इस बीच किन-किन प्रक्रियाओं से होकर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर पहुंचेगा,
सब कुछ जानते हैं बिल्कुल आसान भाषा में विस्तार से। यान की यात्रा की प्रक्रिया को आसानी से समझने से पहले हम उस यान और रॉकेट के बारे में कुछ जानकारियां लेते हैं। जिसके माध्यम से शुभांशु शुक्ला अंतरिक्ष की यात्रा करने जा रहे हैं। शुभांशु शुक्ला एलन मस्क की कंपनी स्पेस एक्स के जिस यान के माध्यम से अंतरिक्ष में जा रहे हैं उसको ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट और जिस रॉकेट के माध्यम से इसको छोड़ा जाता है उसको फाल्कन न कहते हैं,
फाल्कन 9 एक टू स्टेज रॉकेट है जिसमें सबसे नीचे पहली स्टेज का रॉकेट लगा होता है। बीच में दूसरी स्टेज का रॉकेट और इसके सबसे ऊपर ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट लगाया जाता है जिसमें कुल चार अंतरिक्ष यात्री बैठकर अंतरिक्ष में जाते हैं। शुभांशु शुक्ला भी अन्य तीन अंतरिक्ष यात्रियों के साथ इसी जगह बैठकर अंतरिक्ष की यात्रा पर निकले हैं। 25 जून 2025 को लगभग सुबह 9:00 बजे से ही यान लॉन्च की तैयारी शुरू हो गई थी। शुभांशु शुक्ला के अलावा अन्य तीन अंतरिक्ष यात्री लॉन्च के लगभग 2 घंटे पहले ही रॉकेट के साथ लगी लिफ्ट के माध्यम से ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट में जाकर बैठ गए थे,
उनकी कुर्सियों के नीचे उनका जरूरी सामान रख दिया था। उसके बाद अन्य प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद लगभग दोपहर 12:01 पर वो ऐतिहासिक पल आया जब कनेडी स्पेस सेंटर से स्पेस एक्स के ड्रैगन अंतरिक्ष यान की फोल्कन 9 रॉकेट की पहली स्टेज शुरू हुई। पहली स्टेज शुरू होते ही रॉकेट तेजी से चारों अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर आसमान की तरफ बढ़ेगा। फर्स्ट स्टेज के रॉकेट में लगे नौ मरर्लिन इंजन रॉकेट को लगभग 70 कि.मी. ऊपर तक ले जाते हैं और 2 मिनट 40 सेकंड के बाद पहला सेपरेशन होगा जिसमें पहली स्टेज का रॉकेट अलग हो जाएगा और दूसरी स्टेज शुरू हो जाएगी,
अब दूसरी स्टेज में रॉकेट में लगा एक थ्रस्टर स्टार्ट होगा और रॉकेट तेजी से ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने निकलेगा। करीब 8 मिनट 50 सेकंड के बाद दूसरी स्टेज भी यान से अलग हो जाएगी और अब बचेगा सिर्फ ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट। पृथ्वी कक्षा में स्थापित होते ही ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट के आगे का मुंह खुल जाएगा। यह इसलिए खोला जाता है कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को खोजने और उसके साथ जुड़ने में कोई दिक्कत ना हो,
ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट अब पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो चुका है और वह अगले कुछ घंटे में पृथ्वी के गोल चक्कर लगाकर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के समानांतर आने का प्रयास करेगा। इस प्रक्रिया में 28 घंटे तक का समय लगेगा। अंदर बैठे अंतरिक्ष यात्री इस पूरे वक्त में ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट को मैनुअल और ऑटोमेटिकली सामने लगी स्क्रीन से कंट्रोल कर रहे होंगे। जैसे ही ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के समानांतर आ जाएगा अगली प्रक्रिया शुरू होगी,
ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को डॉकिंग करने की यानी ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से जुड़ने की प्रक्रिया के सफर पर निकलेगा। ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट धीरे-धीरे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से जुड़ने के लिए इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की तरफ बढ़ेगा और उसके बिल्कुल करीब पहुंच जाएगा। जैसे ही,
ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के बिल्कुल करीब पहुंचेगा, शुरू होगी इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट के जुड़ने की प्रक्रिया। ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर दो प्रक्रियाओं के माध्यम से जाकर जुड़ता है। जिसमें पहली प्रक्रिया है बर्थिंग और दूसरी प्रक्रिया है डॉकिंग। बर्थिंग प्रक्रिया में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर लगा एक यंत्र ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट को अटैच कर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के गेट पर जोड़ देता है। वहीं दूसरी डॉकिंग प्रक्रिया में ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट खुद से जाकर इंटरनेशनल स्पेस,
स्टेशन के मुंह से जुड़ जाता है। डॉकिंग प्रक्रिया का ही अक्सर सबसे अधिक इस्तेमाल होता है। जैसे ही ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के गेट से जाकर जुड़ता है। ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट में लगे 12 हुक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से उसको बिल्कुल टाइट कर देते हैं और वो उससे जाकर अटैच हो जाता है। करीब 2 घंटे के बाद ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट का हैच खुलता है। साथ ही इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का भी गेट खोला जाता है और अंतरिक्ष यात्री धीरे-धीरे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के अंदर पहुंचते हैं। साथ ही उनका सामान भी इंटरनेशनल,
स्पेस स्टेशन के अंदर लाया जाता है। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर पहले से मौजूद अंतरिक्ष यात्री नए अंतरिक्ष यात्रियों का स्वागत करते हैं। और इस प्रकार शुभांशु शुक्ला और अन्य तीन अंतरिक्ष यात्री इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर पहुंच जाएंगे। लगभग 28 घंटे की यात्रा के बाद एग्जिम फोर मिशन को लेकर ड्रैगन अंतरिक्ष यान भारतीय समयानुसार गुरुवार 26 जून को शाम 4:30 पर आईएसएस पर डॉक कर जाएगा। यानी अंतरिक्ष स्पेस स्टेशन पर पहुंच जाएगा और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का वापस से गेट बंद कर लिया जाता है। इस मिशन में शुभांशु शुक्ला के,
साथ जा रहे अन्य तीन अंतरिक्ष यात्री 14 दिन तक अंतरिक्ष में रहेंगे और अपने प्रयोग करेंगे। इस मिशन में शुभांशु शुक्ला के साथ अमेरिका के पेगी विटसन मिशन कमांडर पोलैंड के स्लावोस उजनासकी मिशन स्पेशलिस्ट और हंगरी के टिबोर कपू मिशन स्पेशलिस्ट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की यात्रा करेंगे। यह चारों अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष स्पेस स्टेशन में 60 से ज्यादा वैज्ञानिक प्रयोग करेंगे। जिनमें सात भारत के हैं। यह प्रयोग माइक्रो ग्रेविटी में किए जाएंगे और इनमें शामिल है कंप्यूटर स्क्रीन के दिमाग पर प्रभाव की जांच, माइक्रो एल्ग और साइनोबक्टीरिया की वृद्धि,
का अध्ययन। मांसपेशियों के कमजोर होने की जांच और उपाय। माइक्रो ग्रेविटी में मेथी और मूंग जैसे बीजों के अंकुरण का अध्ययन आदि शामिल है। शुभांशु शुक्ला का यह मिशन सफल होने के बाद भारत अंतरिक्ष की दुनिया में एक और इतिहास रच देगा। साथ ही आपको बता दें कि शुभांशु शुक्ला अगले साल जाने वाले भारत केत्वाकांक्षी गगनयान मिशन के चार यात्रियों में से भी एक अंतरिक्ष यात्री हैं। इस मिशन का अनुभव उनको गगनयान मिशन को सफल करने में भी काम आएगा। फिलहाल यह जानकारी आपको कैसी लगी? वीडियो को लाइक और नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर अपनी राय जरूर बताएं.



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