ज़मीन पर आक्रमण करने से क्यों घबराती है अमेरिकी सेना, समझिए असली वजह..
क्या अमेरिका ईरान में वही गलती करने जा रहा है जो उसने वियतनाम और अफगानिस्तान में की थी? राष्ट्रपति डोन्ड ट्रंप तेहरान में सत्ता परिवर्तन चाहते हैं और इसके लिए स्पेशल मिलिट्री कैंपेन अपने सातवें दिन में प्रवेश कर चुका है। लेकिन दुनिया भर के सैन एक्सपर्ट एक ही चेतावनी दे रहे हैं। ईरान पर जमीनी हमला अमेरिका के लिए 21वीं सदी में सबसे बड़ी आपदा साबित हो सकता है। यह सिर्फ एक युद्ध नहीं बल्कि अमेरिकी सेना के लिए मौत की घाटी में प्रवेश करने जैसा होगा।
पेंटागन के पूर्व अधिकारियों और रणनीतिकारों का मानना है कि ईरान पर कब्जा करने के लिए कम से कम 15 से 20 लाख सैनिकों की जरूरत होगी। यह संख्या वियतनाम युद्ध से कहीं ज्यादा है। पूर्व पेंटगन अधिकारी आलिया अवदल्ला ने स्पष्ट कहा है कि केवल एयर स्ट्राइक से सत्ता नहीं बदली जा सकती। अगर रिजीम चेंज करना है तो बूट्स ऑन द ग्राउंड यानी जमीन पर सेना उतारनी ही होगी।
लेकिन यही वो फैसला है जिसे लेने से पहले वाशिंगटन के हाथपांव फूल रहे हैं। भौगोलिक अभेद किला जाग्रोस और अलबोस ईरान कोई समतल मैदान नहीं बल्कि कुदरत का बनाया हुआ एक अभेद किला है। इराक सीमा पर 4000 मीटर ऊंची जाग्रोस पर्वत श्रृंखला खड़ी है। ईरान की संकरी घाटियां हमलावर सेना के लिए डेथ ट्रैप है। जहां एंबुश करना दुनिया में सबसे आसान है।
उत्तर में अल्बोर्ज का कवच। यह पहाड़ियां राजधानी तेहरान की रक्षा करती हैं। अलबोर्ज को पार करना किसी भी आधुनिक सेना के लिए बुरे सपने के जैसा है। पहाड़ों के बाद नंबर आता है ईरान के विशाल रेगिस्तानों का। दस्त कावीर और दस्ते लो। 800 कि.मी. में फैली यह बंजर जमीन किसी भी सेना की रसद सप्लाई यानी लॉजिस्टिक्स चेन को तोड़ देगी। भारी टैंक और बख्तरबंद गाड़ियां यहां की रेत और भीषण गर्मी में सुस्त पड़ जाएंगी। जिससे वह ईरानी छापामार लड़ाकों का आसान शिकार बनेंगी। पूर्व मरीन दिग्गज लुकास गिर्द ने चेतावनी दी थी
आप सेना तो उतार देंगे लेकिन उन्हें जिंदा वापस लाना नामुमकिन होगा। इस बीच ईरान के तेवर और भी कड़े हो गए हैं। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराची ने एनबीc न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में अमेरिका को ललकारते हुए कहा है हमें पूरा भरोसा है कि हम उनका सामना कर सकते हैं और यह उनके लिए एक बड़ी आपदा होगी। हम उनका इंतजार कर रहे हैं। ईरान ने पिछले संघर्षों से सबक सीखा है और अब उसे विश्वास है कि अगर युद्ध जमीनी स्तर पर बढ़ता है
तो उसकी सेना अमेरिकी सेनाओं का सामना करने में सक्षम है। देश भर में जारी अमेरिकी और इजराइली हवाई हमलों के बावजूद तेहरान युद्ध विराम की पहल नहीं करेगा। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह बातचीत की भीख नहीं मांगेगा बल्कि मैदान-जंग में जवाब देगा। रणनीतिकारों का एक बड़ा धड़ा मानता है कि अमेरिका सीधे लड़ने के बजाय कुर्द और अजेरी लड़ाकों का सहारा ले सकता है।
लेकिन इतिहास गवाह है कि इतने बड़े और भौगोलिक रूप से मजबूत देश पर प्रॉक्सी वार से निर्णायक जीत हासिल नहीं की जा सकती। यह सिर्फ संघर्ष को लंबा खींचने का जरिया बन सकता है। अमेरिका के लिए ईरान में हार का मतलब सिर्फ एक युद्ध हारना नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी सुपर पावर की छवि को हमेशा के लिए दफन करना होगा। क्या ट्रंप प्रशासन इस जोखिम के लिए तैयार है या फिर इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराने वाला है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के बीच ही ईरान के एक युद्धपोत पर हमले और उसके बाद आई प्रतिक्रिया ने इस संघर्ष को और जटिल बना दिया है। इस पूरे घटनाक्रम में एक छोटा सा देश अचानक चर्चा के केंद्र में आ गया है। जिसने मुश्किल वक्त में ईरान की मदद करके अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नया संदेश दे दिया है। घटना उस समय हुई जब ईरान का आधुनिक युद्धपोत आईआरआईएस देना हिंद महासागर के अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में गश्त कर रहा था। इसी दौरान अमेरिकी सेना की कार्रवाही में जहाज को गंभीर नुकसान पहुंचा और वह डूबने लगा।
यह हमला श्रीलंका के तट से लगभग नौ समुद्री मील दूर हुआ जिससे आसपास के समुद्री क्षेत्र में हड़कंप मच गया। जहाज पर मौजूद कई ईरानी सैनिकों की जान खतरे में पड़ गई और स्थिति बेहद गंभीर हो गई। ऐसे नाजुक समय में ईरान को अप्रत्यक्षित मदद मिली भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका से। श्रीलंका तटरक्षक और नौसेना की रेस्क्यू टीम ने तुरंत कारवाई करते हुए समुद्र में उतर कर डूबते जहाज के क्रू मेंबर्स को बचाने का अभियान शुरू किया। तेज लहरों और तनावपूर्ण हालात के बावजूद कई ईरानी सैनिकों को सुरक्षित बाहर निकाला गया।
इस मानवीय सहायता ने ईरान के लिए एक बड़ी राहत का काम किया है। इस घटना के बाद ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सार्वजनिक रूप से श्रीलंका का अभाव व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि संकट की घड़ी में श्रीलंका ने जिस तरह मदद का हाथ बढ़ाया वह अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मानवीय मूल्यों का उदाहरण है। ईरान ने इससे केवल रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं बल्कि एक दोस्तारा समर्थन के रूप में देखा है। इसी बीच ईरानी विदेश मंत्री ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर से भी फोन पर लंबी बातचीत की।
इस बातचीत में ईरान ने अमेरिका की कारवाई पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि अंतरराष्ट्रीय जल सीमा में किसी युद्धपोत पर हमला करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है। ईरान अब इस मुद्दे को वैश्विक मंचों पर उठाने की तैयारी कर रहा है और कानूनी कारवाई की संभावना भी जता रहा है। ईरान ने अमेरिका की इस कारवाई को समुद्री डकैती जैसा बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। तेरहान का कहना है
कि अगर अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में उसके जहाजों को निशाना बनाया जाएगा तो वह अपने सैनिकों और नौसेना की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। इस बयान के बाद क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम से अमेरिका और इजराइल की चिंता बढ़ सकती है। वजह यह है कि ईरान अब इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री सुरक्षा के सवाल से जोड़कर वैश्विक समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है।
साथ ही श्रीलंका जैसे देश का मानवीय हस्तक्षेप यह संकेत देता है कि यह संघर्ष अब सिर्फ खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा बल्कि इसका असर हिंद महासागर तक पहुंचने लगा है। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के 7 दिन बाद सामने आई यह घटना बताती है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं बल्कि कूटनीति, मानवीय सहयोग और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के सवालों से भी लड़ा जाता है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा वैश्विक राजनीति में और बड़ा रूप ले सकता है। मिडिल ईस्ट में जारी भीषण संघर्ष अब सातवें दिन में प्रवेश कर चुका है और हालात लगातार ज्यादा खतरनाक होते जा रहे हैं।
इसी बीच ईरान ने दावा किया है कि उसने अपने सर्वोच्च नेता अली खामन की मौत का बदला लेना ताबड़तोड़ तरीके से शुरू कर दिया है। ईरान के इस्लामिक रिवॉशनरी गार्ड कॉप्स यानी कि आईआईजीसी ने अमेरिका और इजराइल के ठिकानों के साथ-साथ समुंदर में मौजूद अमेरिकी नौसैनिक बेड़ों को निशाना बनाने का दावा किया है। ईरानी सैन्य कमान खत्म अल अंबिया केंद्रीय मुख्यालय के प्रवक्ता के मुताबिक आया जीसी नेवी ने ओमान की खाली से होमो जलडमरू मध्य की ओर बढ़ रहे अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन को ड्रोन और मिसाइलों से निशाना बनाया है



Post Comment