इस अभिनेत्री को जेल में ख!त्म कर दिया गया, खुद इंदिरा गाँधी इन्हे जि!न्दा छोड़ना नहीं चाहती थी..

एक अभिनेत्री को सरेआम बिना किसी अपराध के बलबूते पर जेल में घुसा दिया जाता है। जिस कोठरी में उस अभिनेत्री को रखा गया उसकी दाएं वाली कोठरी में अटल बिहारी वाजपेई थे। तो बाएं वाली कोठरी में लाल कृष्ण आडवाणी। कुछ साल बीतने के बाद मामला ठंडा हुआ और अटल बिहारी वाजपेई ने जेल में बिताए दिनों को याद करते हुए कहा कि उन्हें एक महिला की चीखने की आवाज आती थी। उसे प्रतिदिन बुरी तरह पीटा जाता था।

उन आवाजों को सुनकर मन बेचैन होता था। अटल जी का मानना था कि उन्हें भ्रम हो रहा है। लेकिन सच्चाई का पर्दा तो तब उठा जब खुद आडवाणी ने भी वह चीखें सुनी। नारदवाणी टीवी पर आज हम उस किस्से के बारे में बात करने वाले हैं जिसे दबाने की पूरी कोशिश हुई। की पेशेंट थी यह महिला। जेपीजी को तो ना करने दिया। अस्थमा की इस पेशेंट को दवा नहीं लेने दी। वो दो बार एस्थेटिक कोमा में गई और में जाते-जाते जब उनकी हालत बिगड़ी तो पेरोल पर उनको 15 जनवरी 77 में छोड़ा। चार्जशीट में इस औरत का नाम नहीं था। और 5 दिन बाद उनका देहांत हो गया।

इनका इतिहास खून से सना है और जिनकी हुई आज वो इनको कटघरे में नहीं ला सकते इसलिए आज इस सदन में मैं उनका नाम ले रही हूं उनके बारे में बोल रही हूं उस महिला पर बेरहमी से जुर्म धाए जाते थे उसकी आवाज दबाई जाती थी उसे ऐसे कमरे में रखा गया जहां कोई एक पल के लिए भी नहीं रुकेगा मल और मूत्र से भरी उस कोठरी में उस जावाज महिला ने ढेर सारे महीने गुजारे और समय-समय पर शारीरिक अत्याचार भी होते थे। कौन थी वह महिला? क्या थी उसकी गलती? कौन उसके खून का प्यासा था? उस महिला का नाम था स्नेहलता रेड्डी और उसके पीछे हाथ धोकर पड़ी थी श्रीमती इंदिरा गांधी।

जी हां दोस्तों, वो इंदिरा गांधी ही थी जिसने उन्हें संसद भवन को डायनामाइट से उड़ाने की योजना बनाने के अपराध में बंदी बनाकर रखा था। लेकिन यह अपराध कानून व्यवस्था को दिखाने के लिए था। असली सच्चाई तो यह थी कि इंदिरा गांधी ने उन्हें बस इसलिए बंदी बनाया था क्योंकि स्नेहलता जॉर्ज फर्नांडिस की करीबी साथीदार थी।

अब आप सोच रहे होंगे कि यह जॉर्ज फर्नांडिस कौन है? असलियत में इंदिरा गांधी के आपातकाल में जिस इंसान ने सबसे बड़ा जन आंदोलन किया था, वह जॉर्ज फर्नांडिस ही थे। इसलिए इंदिरा गांधी ने जॉर्ज के साथ बड़े-बड़े विरोधी पक्ष के नेताओं को जेल में बंद कर दिया। जिनमें स्नेहलता भी शामिल थी। लेकिन स्नेहलता का जज्बा देखकर इंदिरा गांधी का घमंड चूरचूर हो गया और शुरू हुआ दर्द और यातनाओं का कारवा। आप सोच रहे होंगे क्या किसी को भी पकड़ कर जेल में डाल देना इतना आसान हुआ करता था?

जी हां, यह काम आसान तो नहीं था, लेकिन स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने इस काम को बहुत सरल कर दिया था। उन्होंने चतुराई से मीसा नामक कानून बनाया और व्यवस्था को खुली छूट दे दी कि आप बस मात्र शक के आधार पर किसी को भी जेल में ठूस सकते हैं। फिर क्या था? जेल यात्रा का वह सिलसिला शुरू हुआ। जिसको आज भी याद करते हुए कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता भी मानने पर मजबूर हो जाते हैं कि इमरजेंसी भारत के इतिहास का सबसे बुरा अध्याय था। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इस एक्ट ने कलाकारों को क्यों टारगेट किया होगा।

क्या स्नेहलता एकमात्र कलाकार थी जिसे इमरजेंसी का खामियाजा भुगतना पड़ा। असलियत में बड़े-बड़े सितारे और फिल्मकारों को भी रडार पर रखा गया। लेकिन इन सब में से सबसे अधिक अत्याचार स्नेहलता पर किया गया। स्नेहलता अस्थमा की मरीज थी। फिर भी उन्हें काल कोठरी में बंद करके रखा गया। उस काल कोठरी में मलमूत्र की भयंकर बदबू आती थी। उसी कोठरी में उन्हें पीटा जाता था। यह सब इसलिए होता था क्योंकि उस वक्त के बागी नेता जॉर्ज फर्नांडिस के अंतर्गत देश की सबसे बड़ी यूनियन थी। वो यूनियन थी रेल वर्कर्स यूनियन। 1974 में ही उन्होंने रेल स्ट्राइक से पूरा भारत बंद कर दिया था। ऐसे में इंदिरा गांधी के आपातकाल में अगर कोई लगाकर देश में आग लगा सकता था तो वे सिर्फ और सिर्फ जॉर्ज फर्नांडिस थे। उन्हें पिंजरे में बंद करने के लिए सरकार ने भी ऐसी चाल चली कि उससे बचकर निकल पाना नामुमकिन था।

मीसा नामक उस कानून के अंतर्गत कांग्रेस सरकार ने बड़ौदा डायनामाइट मामले की नींव रखी और जांच पड़ताल करने के लिए सीबीआई के पालतू अफसर छोड़ दिए। मई 1976 में आनन-फानन में चार्जशीट जारी हुआ और कोलकाता में जॉर्ज फर्नांडिस की गिरफ्तारी हुई। इसके अलावा कुल मिलाकर 24 लोगों को गिरफ्तार किया गया। जिनमें सभी के सभी नामी हस्तियां शामिल थी। लेकिन अचानक सीबीआई की टीम स्नेहलता के घर पहुंची और उन्हें तथा उनके पति पट्टा भी रामा को गिरफ्तार करके ले गई। इतने सारे लोगों की गिरफ्तारी होने के बाद अखबारों में खबर आती है कि यह सभी लोग भारत सरकार की बड़ी-बड़ी इमारतें डायनामाइट लगाकर उड़ाने वाले थे। जिसमें संसद भवन भी था।

लेकिन खास रूप से जॉर्ज के खिलाफ यह खबर फैलाई गई कि वे अपनी यूनियन के लोगों को बोलकर देश की रेलवे ट्रैक उखाड़ने वाले थे और यहां से स्नेहलता की कहानी शुरू होती है। श्रीमती इंदिरा गांधी साहिबा के कहने पर ही स्नेहलता नामक ऐसी शख्सियत को जेल भेज दिया गया जिसका नाम चार्जशीट में बिल्कुल नहीं था। जी हां दोस्तों, यह मामला पूरी तरह से शक के आधार पर टिका था और इंदिरा गांधी का मानना था कि करने के पीछे स्नेहलता का बड़ा हाथ हो सकता है या फिर उनके पास खुफिया जानकारी हो सकती है। इसी जानकारी को खोज निकालने के लिए उन्हें मौत इतनी खतरनाक यातनाएं दी जाती थी। मई 1976 में उनकी कैद हुई और 8 महीने तक बिना किसी ट्रायल के उन्हें बोर के सेंट्रल जेल में रखा गया। इन आठ महीनों के दौरान स्नेहलता दो बार में भी चली गई। फेफड़ों में इंफेक्शन होने के बावजूद उनका इलाज नहीं हो पाया और इंदिरा गांधी के अफसरों को जब पता चला कि स्नेहलता अब मरने वाली हैं तो उन्होंने तुरंत ही स्नेहलता को पैरोल पर जमानत दे दी।

इसका यह मतलब था कि स्नेहलता पर लगाए गए आरोपों की जांच पड़ताल जारी रहेगी। लेकिन आरोपी जेल में नहीं रहेगा। 15 जनवरी 1977 को स्नेहलता आजाद तो हो गई लेकिन मात्र 5 दिन के बाद वो इस दुनिया से चल बसी। उनकी मौत के साथ वे सारी बातें भी मिट गई। जिन्हें कांग्रेस सरकार जानना चाहती थी। सरकार को लगा कि स्नेहलता के साथ हुए अमानवीय व्यवहार और दुष्कर्मों के बारे में किसी को कानों कान खबर नहीं चलेगी। लेकिन वे भूल गए कि उस जेल के बाकी कैदी स्नेहलता की तकलीफों से वाकिफ थे। अटल जी और लाल जी के अलावा मधु दंडावते नामक एक और शख्स सामने आए जिन्होंने स्नेहलता के लिए आवाज उठाई। 21 मार्च 1977 को आपातकाल हटाई गई और बड़ी संख्या में भारत के आवाम ने कांग्रेस के खिलाफ वोट देकर सरकार गिरा दी और जनता पार्टी की सरकार बन गई।

कांग्रेस की नैया डूबते ही जॉर्ज फर्नांडिस समेत 24 लोगों को बशर्ते जमानत मिल गई। फिर क्या था? जमानत मिलते ही उन लोगों ने गड़े मुर्दे उखाड़कर जनता को हक्का बक्का कर दिया। इन सब में से कर्नाटक ह्यूमन राइट्स कमेटी ने एक डायरी जारी करते हुए साबित कर दिया कि कांग्रेस के कारण उस जमाने की जानीमानी अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी की मृत्यु हुई है। स्नेहलता द्वारा लिखी गई उस डायरी के कुछ पन्ने आप स्क्रीन पर देख सकते हो। आगे चलकर स्नेहलता की बेटी नंदिना ने अपनी मां के नक्शे कदम पर चलकर मानवीय अधिकारों के लिए कार्य किए। साथ ही बाल अधिकारों को सशक्त करने के कार्य के लिए उन्हें 2012 में नोबेल प्राइज के लिए नॉमिनेशन भी मिला। स्नेहलता रेड्डी का जन्म 1932 को आंध्र प्रदेश में ही हुआ था। ईसाई परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपना ईसाई नाम बदलकर स्नेहलता इसलिए रखा क्योंकि वह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाती थी। साथ में उनके दोस्त पट्टाबी रामा भी बढ़-चढ़कर आंदोलन में हिस्सा लेते थे। आपको जानकर हैरानी होगी कि महात्मा गांधी की तरह स्नेहलता भी सूती के कपड़े पहनती थी।

आंदोलन के दौरान तो स्नेहलता 14-15 साल की थी। लेकिन अंग्रेजों के चले जाने के बाद स्नेहलता अपने दोस्त के साथ अभिनय क्षेत्र में उतर गई। उसके बाद 1970 में उन्हें संस्कार फिल्म के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवार्ड मिला। और इसी फिल्म के डायरेक्टर तथा उनके ही बचपन के दोस्त पट्टाबी रामा से शादी भी कर ली।

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा वैसे-वैसे उन्होंने कांग्रेस के खिलाफ आवाज उठाया और आखिरकार उनकी आवाज को इस तरीके से दबाया गया। आज के वक्त स्नेहलता को भले ही कोई जानता नहीं होगा लेकिन इतिहास के पन्ने पर उनका नाम खून की स्याही से लिखा गया है।

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