ताज होटल पर आ*तंकी ह*मले के वक्त टाटा की सोच ने पूरे देश को झ’कझो’र दिया। 26/11 की उस भ’यावह रात जब मुंबई द*हल रही थी, तब रतन टाटा के लिए सबसे कीमती चीज़ होटल या मुनाफ़ा नहीं, बल्कि इंसानी ज़िंदगियाँ थीं।
बताया जाता है कि उन्होंने साफ कहा—
“अगर ज़रूरत पड़े तो पूरी बिल्डिंग गिरा दीजिए, लेकिन एक भी आ*तंकी ज़िंदा बाहर नहीं निकलना चाहिए।”
यह फैसला व्यापारिक सोच से नहीं, बल्कि राष्ट्र और इंसानियत के प्रति ज़िम्मेदारी से लिया गया था।
टाटा के लिए इमारतें दोबारा बन सकती थीं, लेकिन खोई हुई ज़िंदगियाँ नहीं।
यही वजह है कि जब बात देश की आती है,
टाटा सिर्फ़ उद्योगपति नहीं, एक विचार बनकर खड़े होते हैं।