स्नेहलता रेड्डी की आज बात करना जरूरी है जेल में बंद किया गया इसलिए बंद किया गया क्योंकि वह सोशलिस्ट थी आज की दास्ता है एक ऐसी खूबसूरत अदाकारा की जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक शहीद अदाकारा कहलाई इनकी लाजवाब अदाकारी को आज भी दर्शक याद किया करते हैं पर आखिर इस खूबसूरत अदाकारा ने ऐसा क्या कर दिया कि अपने खुद के ही देश में अपनी ही सरकार ने इनको दिल दहला देने वाली सजा दीरी रात म क्यों इन्हें तड़पा तड़पा कर मरवा दिया गया मैं आपसे यकीन से कह सकता हूं कि आज जब आप इस अभिनेत्री की पूरी जीवन की कहानी सुनेंगे तो सुनने के बाद आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे आंखों से आंसू खुद बखुदा ऐसा क्या कर दिया था कि अदाकारा को सभी के सामने निवत कर दिया गया था ऐसे इस अभिनेत्री की मौत के बाद भारत के इतिहास के पन्नों में काले अक्षरों में लिखा गया प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम तो आइए इस अदाकारा की पूरे जीवन की प्रतारक को जानते हैं नमस्कार दोस्तों स्वागत है आप सभी का आपके अपने फेवरेट [संगीत] रहे हैं स्नेहा लता रेड्डी की जिनका जन्म वर्ष 1932 को आंध्र प्रदेश के एक धर्मांतर ईसाई परिवार में हुआ,
वैसे तो इनका परिवार पीढ़ियों से हिंदू था पर जब स्नेहा का जन्म हुआ तो इनके परिवार ने हिंदू से ईसाई धर्म अपना लिया था रही बात इनके परिवार की तो इनका परिवार बेहद तंगी गरीबी और दुख तकलीफ में ही जीवन व्यतीत कर रहा था पर इस गरीबी के बीच भी इनके परिवार ने स्नेह को पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी स्नेहा ने अभी स्कूल जाना ही शुरू किया था कि उनके मन में सिर्फ एक ही बात रहती कि कम से कम मैं पढ़ लिखकर इतना तो बन जाऊं कि अपने परिवार को जीवन सरलता से तो व्यतीत करवासकूं तो स्नेहा का बचपन गरीबी में भले ही बीत रहा हो पर इनके मन में बचपन से ही कुछ कर दिखाने का जुनून पनपता रहा थोड़ा सा समझदार हुई तो इन्होंने अपने आसपास अंग्रेजी हुकूमत का जुर्म देखा शायद यही कारण था कि स्नेहा सभी वजहों से काफी क्रांतिकारी और बगावती हो गई थी
उनके मन में हमेशा से सिर्फ यही बात चलती कि कैसे मेरी पढ़ाई पूरी हो जाए और दूसरी बात थी तो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बगावत शायद यही कारण होगा कि उन्होंने हमेशा हमेशा के लिए अपना ईसाई नाम बदलकर अपना हिंदू नाम स्ने लता रख लिया हमेशा हमेशा के लिए क्रिश्चन वेशभूषा का परित्याग कर दिया और भारतीय वेशभूषा को अपना लिया अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता को देखकर उनके मन में हमेशा से ब्रिटिशर्स के खिलाफ बगावत बनी रहती हां मगर उन्होंने कभी भी अहिंसा का रास्ता नहीं चुना पढ़ाई के दौरान वह अक्सर आजादी पर आधारित नाटकों में हिस्सा लेती बिटि राज लालाजी की ह किए लाला जी हम आपकी हत्या का बदला ले कर रहेंगे ताकि जैसे भी हो लोगों को आजादी के अधिकार के प्रति जागरूक किया जाए [संगीत] मुर्दाबाद अब यह नाटकों का सिलसिला स्नेहा की अति रुच में बदल गया इधर कॉलेज की पढ़ाई समाप्त हुई तो स्नेहा लता ने एक थिएटर ग्रुप जवाइन कर लिया इस थिएटर ग्रुप का नाम था मद्रास प्लेयर यह उस समय का बहुत बड़ा थिएटर ग्रुप था
इस थिएटर ग्रुप में अक्सर बड़े-बड़े फिल्म निर्माता निर्देशक आया करते थे और अपनी फिल्म के लिए कलाकारों का चयन किया करते उन्हीं दिनों वहां पर कन्नड़ तेलुगु फिल्म निर्देशक पट्टा मी राम रेड्डी आए वहीं पर उनकी मुलाकात स्नेहलता से हुई और यह मुलाकात कब दोस्ती में बदल गई पता ही नहीं लगा शायद इसका कारण यह भी था कि स्नेहलता एक अच्छी एक्टर के साथ-साथ एक बहुत अच्छी पाठ कथा लेखिका भी थी और दोनों के विचार इतना मेल खाते कि पलक झपकते यह दोस्ती मोहब्बत में बदल गई वैसे दोनों के परिवारों को यह रिश्ता कबूल नहीं था पर स्नेहा ने ने परिवार के खिलाफ जाकर शादी कर ली शादी के बाद स्नेहा लता रेड्डी फिल्मों में काम करने लगी यह सभी के सभी फिल्में समाज में चल रही कुप्रथा हों पर ही आधारित रहती हां इनमें अधिकतर फिल्में तो इनके पति के द्वारा ही बनाई जाती
इन कुप्रथा हों को फिल्मों के माध्यम से इस नासमझ समाज को समझाना बेहद मुश्किल था शायद यही कारण था कि इनकी फिल्मों का हमेशा विरोध होता पर इसने लता ने अपने तरीके से समा को जागरूक करने की तो ठान ली थी भले ही उनकी फिल्मों का विरोध हो उन्होंने फिल्में बनाना कभी बंद नहीं किया तभी उनकी एक ऐसी फिल्म आई जिसे आज तक की कन्नर सिनेमा की सबसे मशहूर फिल्म माना गया इस फिल्म का नाम था संस्कारा वर्ष 1971 को इस फिल्म के प्रदर्शन को लेकर बहुत बवाल हुआ मद्रास सेंसर बोर्ड ने चार वर्षों तक इस फिल्म के रिलीज पर ही रोक लगा दी पर उसके बावजूद स्ने लता ने हार नहीं मानी वह अदालत गई और अदालत के फैसले के बाद इस फिल्म से रोक हटा दी गई चार वर्षों की रोक के बाद जब यह फिल्म रिलीज हुई तो दर्शकों का भारी हुजूम फिल्म को देखने के लिए टूट पड़ा
इस फिल्म के रिलीज होने के साथ ही अवार्ड की बौछार भी होने लगी यह सभी के सभी पुरस्कार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के थे हां अब स्नेहा लता रेड्डी को एक राष्ट्रीय अदाकारा के रूप में जाना जाने लगा था फिल्म की सफलता के बाद स्नेहा लता ने मद्रास और बेंगलोर में थिएटर की स्थापना की इन थिएटर के माध्यम से स्नेहा लता ने समाज में चल रही कुप्रथा हों को हमेशा उजागर करती इन्हीं सबके चलते स्नेह लता की इमेज पूरे भारतवर्ष में एक अदाकारा के साथ-साथ एक सामाजिक कार्यकर्ता की भी हो रही थी अब इसने लता का नाम राजनीत के बड़े-बड़े गलियारों में गूंज रहा था शायद इसी के चलते इनकी और इनके पति की पहचान न राजनीतिक धुरंधर जॉर्ज फर्नांडिस से हुई जर्ज फर्नांडिस उन दिनों एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक अच्छे राजनीतिक थे कुछ ही दिनों बाद जॉर्ज फर्नांडीस से इनकी अच्छी दोस्ती हो गई पर शायद ही किसी ने सोचा होगा
कि यह दोस्ती एक दिन स्नेहा लता के लिए नरक का द्वार बन जाएगी साल था 1975 और वह 25 जून की काली रात थी शायद भारत देश के इतिहास की इस काली तारीख से ही इनके जीवन में घोर अंधेरा आने वाला था जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था इस दिन भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरे देश को रेडियो पर संबोधित किया देश में आपातकाल लगाने की घोषणा कर दी भाइयों और बहनों राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है अब आपातकाल लगने के बाद नागरिकों पर देश के खिलाफ बोलने पर पाबंदी लग गई थी राजनीत से जुड़े छोटे बड़े सभी नेताओं और अभिनेताओं को जबरन जेल में पकड़ पकड़ के डाला जा रहा था और उन्हीं नेताओं में एक नाम था
जॉर्ज फर्नांडीस इंदिरा गांधी के लिए नाम नकेल बन गया था किसी भी हाल में उन्होंने आदेश दे दिए थे कि जॉर्ज फर्नांडिस को पकड़कर लाना ही लाना है दरअसल जॉर्ज फर्नांडिस को बंदी बनाया जाना इसलिए भी आवश्यक था कि आपातकाल के पहले रेलवे कर्मचारियों की बेहतर सुविधाओं को लेकर जॉर्ज फर्नांडीस हड़ताल कर चुके थे और यह हड़ताल दुनिया की सबसे बड़ी हड़ताल थी मार उनकी बेटी बताती हैं कि आपातकाल के दौरान स्नेहा लता की मुलाकात अपने राजनीतिक दोस्त जॉर्ज फर्नांडीस से हुई जॉर्ज फर्नांडीस ने पूरी रूपरेखा स्नेहलता को बताई वह किस तरह से इंदिरा गांधी के खिलाफ एक मूवमेंट चलाने वाले हैं कांग्रेस को हटाना है इंदिरा राज खत्म करना है पर स्नेह लता को जॉर्ज फर्नांडीस का प्लान बिल्कुल पसंद नहीं आया उसका कारण यह था कि स्ने लता अहिंसा वादी थी
उन्हें हिंसा बिल्कुल पसंद नहीं थी पर जॉर्ज फर्नांडीस हिंसा की बात कर रहे थे शायद इसीलिए स्नेहा लता रेड्डी ने अपने आप को जॉर्ज फर्नांडीज से बिल्कुल अलग कर लिया इधर इंदिरा गांधी फर्नांडिस को पकड़ना चाह रही थी स्नेहा लता रेड्डी और जॉर्ज फर्नांडिस की दोस्ती की खबर सरकार तक पहुंच गई थी इंदिरा गांधी ने जॉर्ज फर्नांडीस को पकड़ने के लिए शिकंजा कसा और अंतत उन्होंने जॉर्ज की दोस्त स्नेह लता को पकड़ा तो 27 अप्रैल 1976 की व रात जब स्नेहा लता और उनके पति किसी काम के सिलसिले में बंगलोर के लिए रवाना हुए शायद यह वह समय था जब इसने लता के जीवन में बुरे वक्त ने दरवाजा खटखटा दिया था दरअसल इधर यह दोनों एक साथ मद्रास पहुंचे और उधर बेंगलोर में इनके घर पुलिस पहुंच गई दरवाजे पर खटखट की आवाज हुई स्नेहलता के बेटे ने पूछा कौन बाहर से आवाज आई टेलीग्राम है सर इधर दरवाजा खुला और पुलिस के कर्मचारियों ने भूखे भेड़िए की तरह अंदर घुसकर पूरे घर को तितर बितर कर दिया घर वालों को उस रात पूछताछ के नाम पर खूब टॉर्चर किया गया सब चेक किए सर कुछ नहीं मिला कुछ नहीं है सर सर आपको जब सुबह स्नेहा लता रेड्डी घर पहुंची तो पुलिस ने उनके घर से थोड़ी दूर पर ही उन्हें रोक लिया और हिरासत में ले लिया स्नेहा लता भी घर नहीं पहुंच पाई थी
उनसे कहा गया थोड़ी सी पूछताछ करनी है आप थोड़ी देर के लिए थाने चली चलिए पति से कहा गया आप घर जाइए हम अभी खुद बखुदा स्नेहा लता रेड्डी को काल्टर हाउस ले जाया गया उस रात स्नेहा लदा वापस नहीं आई और इसी तरह तीन रातें गुजर गई पति और परिवार को कुछ भी नहीं पता था कि आखिर स्नेहा लता रेड्डी के साथ क्या हो रहा है बड़ी कशमकश के बीच उनके पति को तीन दिन बाद यह पता लगा कि उनकी पत्नी को बड़ोदरा डायनामाइट केस में मुख्य दोषी बनाया गया है कहा गया कि स्नेहा लता रेड्डी संसद भवन और कुछ सरकारी मंत्रालयों को बम से उड़ाने की योजना बना रही हैं इसके साथ ही स्नेहा लता रेड्डी पर मीसा एक्ट भी लगाया गया यह एक्ट था जिसमें आपातकाल के समय सरकार के खिलाफ बोलने वाले को जेल में डाल दिया जाता था किसी एक ग्रुप को कंट्रोल करते हैं तो कल दूसरा कोई सर उठा लेता है
पर शायद अब तक स्नेहा लता रेड्डी के साथ जो भी हो रहा था वह एक नाटक था असल बात शायद यह थी कि उस समय इंद्रा जी स्नेह लता को डरा धमका कर जॉर्ज फर्नांडिस का पता निकलवाना चाह रही थी पर स्नेहा लता कुछ जानती हो तो बताएं अब इंदिरा गांधी ने उन्हें बेंगलोर सेंट्रल जेल भेज दिया स्नेहा लता रेड्डी को अन्य कैदियों से अलग रखा गया यह काल कोटरी थी अगर साथ देने को कोई था तो वो था अंधेरा भया यह इतनी छोटी जगह थी कि एक व्यक्ति पूरी तरीके से लेट भी नहीं सकता हमारे और आपके लिए कल्पना कर पाना भी कठिन है इस छोटे से कमरे में मल मूत्र करने के लिए सिर्फ एक छेद था हां रोशनी की तो बात करिए ही नहीं कहीं से भी एक भी सूर्य की किरण अंदर नहीं आ सकती थी अंदर अगर कुछ था तो मच्छर कीड़े मगड़े गंदगी और एक अजीब तरीके की सड़न ऐसी नरक भरी जिंदगी जिसे सोच पाना भी हमारे रूह को कपा देता है
आपको बता दें कि स्नेहा लता रेड्डी को बचपन से ही सांस की बीमारी थी सोचिए अस्थमा की एक गंभीर मरीज स्नेहा लता उस सड़न में जीवन गुजार रही थी उसी काल कोठरी में वह मलम पूत्र करती उसी काल कोठरी में इसने लता एक बेगुनाह होने के बाद भी अपराधी का जीवन जीने में मजबूर थी अभी आप रुकिए शायद अभी प्रतारक थी क्योंकि जेल में एक टॉर्चर रूम भी था जहां उन्हें ले जाकर पूछताछ के नाम पर उनके सारे कपड़े उतरवा दिए जाते अगर स्नेहा मना करती तो उनके कपड़े फाड़ दिए जाते उन्हें दम भर के पीटा जाता और जबरन सभी के सामने उन्हें नंगा रखा जाता शायद उन रातों को क्रूरता भी अपने आप में डरने लगी होगी स्नेहा लता रेड्डी को कैद में बद से बदतर खाना दिया जाता सिर्फ और सिर्फ दिन रात यही पूछा जाता जॉर्ज फर्नांडीस कहां है और रोती बिलखती स्नेहा लता रेड्डी सिर्फ यही कहती मैं सच कह रही हूं
मुझे कुछ भी नहीं पता पर शायद यह सजा उनकी दोस्ती का मुआवजा थी वह क्या जवाब देती स्नेहा लता रे की इस बेरहम सरकार ने एक ना सुनी का ऐसे गला घटेगा हर आवाज जो उसके खिलाफ उठेगी कु जलती जाएगी ऐसी ऐसी रोज यातनाएं दी जिनका अंत सिर्फ मौत हो सकता था आपको बता दें कि इस जेल में उस जमाने के जानेमाने नेता लाल कृष्ण अडवाणी और अटल बिहारी वाजपेई भी कैद थे यह सब अक्सर रात में एक महिला के चीखने की आवाज सुनते यह आवाज इतनी ज्यादा यातना हों वाली थी कि यह सब सुनकर उनके माथे पर भी भय के मारे बल पड़ जाया करते [संगीत] थे उन्हें बाद में पता लगा कि यह आवाज अदाकारा स्नेहा लता रेड्डी जी की है स्नेहा लता रेड्डी जी ने अपने कैद के दौरान अपने अनुभवों को कागज के पन्नों में बया किया जिसे बाद में कर्नाटक मानवाधिकार आयोग ने अ प्रिजन डायरी के नाम से पब्लिश किया उसमें लिखा था
यह वह जगह है जहां एक इंसान भी पर्याप्त से नहीं रह [संगीत] सकता इतना जुल्म और यातना सहन करके स्नेहा लता मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर पड़ चुकी थी और यह कमजोरी अस्थमा की वजह से चार गुना तकलीफ दे रही थी शायद वह मौत की कुहार लगा रही थी कौन सा ऐसा दिन हो कि उन्हें मौत आ जाए बीमार इसने लता को निर्दय जेल के अधिकारी स्वास्थ्य संबंधी कोई भी सुविधा नहीं मुहैया कराते इधर इनका पूरा परिवार इस बात के लिए व्याकुल था कि कब तक स्नेहा लता को जेल में रखेंगे आखिर कौन सा ऐसा दिन होगा जब वह घर आएंगी कोई कुछ भी नहीं कह पा रहा था एक दूसरे को तसल्ली देते देते आठ महीने बीत गए थे तभी एक दिन एक अनजान फोन आया इस फोन को उनकी बेटी नंदा रेड्डी ने उठाया अगली आवाज उनकी मां स्नेहलता की थी किसको दोष दोगे थोड़े दिन तो रह गए हैं नंदा रेड्डी कहती हैं आज भी वह सब सोचकर दिल जोर से धड़कने लगता है वह कहती हैं उनकी मां ने बोला बेटी आज मुझे लोग हॉस्पिटल लाए हैं
तुम मिलने आओगी क्या बेटी नंदा रेड्डी कहती हैं मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था फोन के बाद नंदा इतना रोई कि शायद ही वह आज तक कभी रोई हूं और भागते भागते विक्टोरिया हॉस्पिटल पहुंच गई अपनी मां को देखकर नंदा रेड्डी चिपट गई और इधर स्नेहा लता भी अपनी बेटी को पकड़कर चूमने लगी बार-बार उनके बालों को सलाती और चूमती ही चली जाती नंदा ने भी अपनी मां को मानो ऐसे पकड़ा था कि अब उन्हें उनसे कोई छुड़ा ही नहीं सकता तब तक पुलिस का एक सिपाही आकर बोला अब बाहर जाओ तुम्हारा वक्त खत्म हो गया है हॉस्पिटल से टेंपरेरी दवाएं करवाने के बाद स्नेहा लता रेड्डी को पुलिस वैन में खींच कर बैठा दिया गया वैन फिर जेल चली गई स्नेहा लता रेड्डी दिन पर दिन दुबली होती चली गई वह इतना दुबली हो गई मानो हड्डियों पर एक पतली मांस की परत चढ़ी हो अस्तमा भी अब चार गुना बढ़ गया था
बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण स्नेहा लता रेड्डी को जेल प्रशासन ने मजबूरी में कुछ दिनों के लिए पेरो पर छोड़ दिया 15 जनवरी 1977 को स्नेहा लता रेड्डी घर वापस आ गई स्नेहा लता रेड्डी घर पर पेरोल पर वापस आई थी उनकी हालत बिगड़ी तो पेरोल पर उनको 15 जनवरी 77 में छ पर जेल की क्रूरता उनके मन में बस गई थी उन्हें हमेशा यह डर बना रहता कि उन्हें अभी फिर जेल जाना है पिछली अमानवीय क्रूरता को सोच सोच कर छूटने के पा दिन बाद ही 20 जनवरी 1977 को वो परलोक सिधार गई और पाच दिन बाद उनका देहांत हो गया इनका इतिहास खून से सना है अब स्नेहा को इस नर की दुनिया से छुटकारा मिल गया था पुलिस के पास स्नेहा लता के खिलाफ कोई सबूत नहीं था फिर भी उन्हें आठ महीनों तक इन यातना हों को झेलना पड़ा शट में इस औरत का नाम नहीं था एक महान अभिनेत्री लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता होने के बाद भी स्नेहा लता रेड्डी को कैद में वह सारी प्रतारक एक आतंकवादी को दी जाती हैं आज भी उनकी बेटी नंदा रेड्डी कहती हैं उनके साथ हुई बर्बरता क्रूरता नंगे पन को सोचकर उनकी रूह कांप जाती है नंदा रेड्डी इंदिरा गांधी को अपनी मां का कातिल मानती हैजन मतलब ऐसे कैसे पुलिस निहती जनता पर गोलियां चला सकती है नंदा जो कि एक सोशल एक्टिविटीज हैं जब भी वह अपनी मां के बारे में सोचती हैं और किसी से भी बात करती हैं तो उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं
अपने आर्टिकल्स में हमेशा यही लिखती है कि उनकी मां अपनी मौत नहीं मरी उन्हें मारा गया है उन्हें भारत सरकार ने मारा है इंदिरा राज खत्म करना है सत्ता और राजगद्दी के लालच में देश में इमरजेंसी लगाई गई न जाने कितने लाख लोगों को जेल में डाल दिया गया इसने लता रे ड्डी के साथ जो भी हुआ शायद इसी कारण उन्हें आपातकाल का पहला शहीद कहा जाता है वैसे उत्तर के इलाके में स्नेह लता रेड्डी को शायद ही कुछ लोग जानते हो लेकिन दक्षिण के इलाके में स्नेह लता रेड्डी की पूजा की जाती है इन्हें लोग एक शहीद के रूप में जानते हैं पर आप बताइएगा कि कभी आपने क्या इस अभिनेत्री का नाम सुना था कि कोई ऐसी भी अभिनेत्री हैं जिनको इतनी बेदर्दी से हमारी सरकार ने मौत के घाट उतार दिया अगर नहीं सुना तो कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा और अगर आपने हमारे वीडियो के माध्यम से इनकी कहानी को सुना तो यह भी जरूर बताइएगा
कि आपको हमारा यह वीडियो आखिर कैसा लगा अगर पसंद आया हो तो प्लीज लाइक जरूर कर दीजिएगा क्योंकि इस 20 से 25 मिनट के वीडियो में हमें बनाने में लगभग 30 से 40 घंटे लगे हैं आपका एक लाइक हमारी मेहनत को साकार कर देता है वैसे आपने इस वीडियो को अंत तक देखा इसके लिए तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूं क्योंकि आपका एक-एक व्यू मुझे और मेरे परिवार को किसी ना किसी रूप में आर्थिक मदद करता है तो इसलिए मैं आपका हमेशा रेडी रहूंगा और अगर आपको भारतीय सिनेमा के ऐसे ही कलाकार के बारे में जानना है जो भारत देश के लिए अंग्रेजों से लड़ा और जिसे फांसी की सजा तक हो गई तो दाई तरफ आ रहे है वीडियो को जरूर क्लिक करिएगा चलिए मिलते हैं