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धूल में फूल ढूंढता रहा। और जबकि मेरे अपने घर में रात की रानी खिली है। यह कहानी बॉलीवुड की सबसे चर्चित और उलझी हुई लाइफ में से एक है। और आज हेमा मालिनी ने खुद 50 साल पुराना राज खोल दिया है। दोस्तों धर्मेंद्र, हेमा और प्रकाश कौर इन तीन नामों के पीछे ऐसा सच छुपा है जिसे लोग आधी सदी से जानना चाहते थे। क्या वाकई प्रकाश कौर ने वह बात कही जिसने पूरा मामला बदल दिया? क्या सच में हेमा मालिनी ने एक ऐसा सीक्रेट स्वीकार किया जिस पर किसी ने यकीन तक नहीं किया था? आज की इस वीडियो में हम उसी छुपे सच, उस अनकही कहानी और उन खुलासों पर बात करेंगे जिन्होंने सोशल मीडिया से लेकर बॉलीवुड तक टहलका मचा दिया है,
दोस्तों, अगर आप धर्मेंद्र और हेमा की रियल कहानी जानना चाहते हैं, तो यह वीडियो बिल्कुल मिस मत कीजिएगा। इसी तरह की और रहस्यमई जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारे चैनल ट्रू हिस्ट्री को आज ही सब्सक्राइब करें और बेल आइकॉन को प्रेस करें। चलिए शुरू करते हैं 50 साल पुराने इस राज के दरवाजे खोलना। दोस्तों कहानी शुरू होती है 16 अक्टूबर 1948 से। तमिलनाडु के एक शांत संस्कारी ब्राह्मण परिवार में एक बच्ची जन्म लेती है जिसका नाम रखा जाता है हेमा। किसी को क्या पता था कि यही बच्ची आगे चलकर ड्रीम गर्ल बनेगी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि हेमा को खुद फिल्मों में जाने का कोई शौक ही नहीं था। असल सपना तो उनकी मां जया लक्ष्मी देख रही थी,
एक ऐसा सपना जिसमें उनकी बेटी बड़े पर्दे पर चमके जिसकी खूबसूरती के किस्से पूरे देश में फैले जिसकी मुस्कान पर लाखों दिल फिसल जाए और इसी सपने को सच करने के लिए हेमा का बचपन धीरे-धीरे बचपन रह ही नहीं पाया। जब दूसरी लड़कियां स्कूल की यूनिफार्म पहनकर कक्षा में बैठती थी। हेमा घंटों भर भरनाट्यम की ताल पर पसीना बहा रही थी। जया लक्ष्मी ने तय कर लिया था बेटी को पढ़ाई नहीं। ग्लैमर की चमक चाहिए। इसी जुनून में जब हेमा 12वीं कक्षा में थी, उनकी मां ने एक बड़ा फैसला ले लिया। हेमा, पढ़ाई छोड़ो चेन्नई चलो। अब जिंदगी सिर्फ फिल्में की है,
साल 1963। पहली बार उन्हें मौका मिलता है एक तमिल फिल्म ईदु साथियाम में डांसर बनने का। छोटा सा रोल। लेकिन एक बड़ी उम्मीद। 2 साल बाद 1965 में पांडवा वंशम में फिर एक डांस नंबर। लेकिन दोस्तों यह वो समय था जब कैमरे की रोशनी कम और संघर्ष की परछाइयां ज्यादा थी। मशहूर निर्देशक सीवी श्रीधर ने उन्हें स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया। हेमा पहुंची उम्मीदों से भरी दिल में बारिश की पहली बूंद जैसा उत्साह। लेकिन वहां जो हुआ, वह किसी भी लड़की के लिए टूट जाने जैसा होता। सबके सामने। उन्हीं की आंखों में देखते हुए निर्देशक ने कहा, इस लड़की में हीरोइन बनने की कोई क्वालिटी नहीं है। यह स्क्रीन पर अच्छी नहीं लगेगी। तमिल फिल्मों की लीड एक्ट्रेस कभी नहीं,
यह सुनते ही हेमा का चेहरा जैसे बुझ गया। वो घर लौटी लेकिन वो रोना सिर्फ दर्द का नहीं था। वो एक नए इरादे का जन्म था। उस रात हेमा ने फैसला कर लिया। तमिल फिल्मों में छोटे रोल नहीं। अब मैं बॉलीवुड जाऊंगी और वहीं साबित करूंगी कि असली हीरोइन कौन है। कहते हैं ना जब जिंदगी आपको धक्का देती है तब किस्मत आपको दूसरी तरफ से खींच भी लेती है। हेमा मालिनी के साथ भी ऐसा ही हुआ। कुछ ही समय में एक ऐसी सुनहरी किरण उनकी जिंदगी में दाखिल हुई, जिसने उन्हें सिर्फ स्टार नहीं, बॉलीवुड की ड्रीम गर्ल बना दिया। साल 1968, राज कपूर की फिल्म सपनों का सौदागर और उसी फिल्म में पहली बार हेमा मालिनी लीड हीरोइन के रूप में पर्दे पर उतरी और बस उस एक रात में सब बदल गया। पिछले सारे रिजेक्शन, सारे ताने और वह तमिल निर्देशक की कटु बातें सब जैसे धुएं की तरह उड़ गई। लोगों ने कहा,
“यह लड़की तो हीरोइन बनने के लिए ही जन्मी है। और मजेदार बात वही सीवी श्रीधर जिन्होंने कभी कहा था कि हेमा हीरोइन नहीं बन सकती। बाद में खुद मान गए कि हेमा मालिनी ने उनकी सोच को चूर-चूर कर दिया। फिर शुरू हुआ एक फिल्म दो फिल्म नहीं पूरा सुनामी। शराफत आपबीती राजा रानी नए जमाने हर फिल्म के साथ हेमा मालिनी का नाम और ऊपर और चमक और तेज होती चली गई। लेकिन दोस्तों यह सिर्फ फिल्मों की कहानी नहीं थी। यह उन दिलों की कहानी भी थी जो हेमा की खूबसूरती पर फिदा होकर उनके दरवाजे तक जा पहुंचे। उस दौर का हर बड़ा अभिनेता कहिए तो आधा बॉलीवुड उन पर दिल हार चुका था। यहां तक कि सुपरस्टार राजकुमार जिन्हें लोग एटीट्यूड का बादशाह कहते थे उन्होंने भी हेमा को शादी का प्रस्ताव दे दिया,
लेकिन हेमा ने राजकुमार के रॉब रुतबे के बावजूद उन्हें साफ मना कर दिया और फिर आते हैं संजीव कुमार। वो अभिनेता जिसके भीतर समंदर जैसी गहराई थी और एक नाम हेमा जिसमें वह पूरी तरह डूब चुके थे। कई फिल्मों में साथ काम करते-करते संजीव कुमार उनसे बेइंतहा मोहब्बत करने लगे। उन्होंने शादी का प्रस्ताव दिया। हेमा ने मना कर दिया। दर्द इतना गहरा था कि संजीव कुमार ने अपने हाथ पर हेमा का नाम टैटू तक खुदवा लिया। लेकिन असली वजह सिर्फ प्यार नहीं थी। वजह थी दो माएं। हेमा की मां चाहती थी बेटी फिल्में छोड़े बिना चमकती रहे। संजीव कुमार की मां चाहती थी शादी के बाद हेमा घर संभालें फिल्में छोड़ दें और यहीं दो सोचों का टकराव दो दिलों को अलग कर गया,
कहानी अगर यहां से ना मुड़ती तो शायद आज बसंती की ससुराल ठाकुर परिवार होती। लेकिन किस्मत ने लिख रखा था कुछ और ही। कुछ ऐसा जो आगे चलकर पूरे बॉलीवुड को हिला देने वाला था। दोस्तों यह कहानी अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां दिल की धड़कनें जरा तेज हो जाती हैं और रिश्तों की रफ्तार किसी फिल्मी सीन से कम नहीं लगती। एक तरफ पूरा बॉलीवुड, सुपरस्टार, हीरो, दिग्गज अभिनेता, सब हेमा मालिनी की एक मुस्कान पर दिल हार चुके थे। लेकिन दूसरी तरफ एक ऐसा इंसान था जिसका असर हेमा के दिल पर सबसे गहरा, सबसे सच्चा और सबसे चुपचाप पड़ा। धर्मेंद्र। दिलचस्प बात यह है कि धर्मेंद्र और हेमा की मुलाकात शोले के सेट पर नहीं हुई थी,
लोग सोचते हैं कि बसंती और वीरू की कहानी वहीं से शुरू हुई। लेकिन सच्चाई यह है कि इस मोहब्बत की शुरुआत कई साल पहले ही हो चुकी थी। वे एक साथ लगातार फिल्में कर रहे थे। सीन दर सीन दिन दर दिन और इन्हीं पलों के बीच कुछ ऐसा हुआ जो ना उनकी नजर को पता चला ना दिल को। पर दोनों को एक दूसरे की तरफ धीरे-धीरे खींचता चला गया। उस वक्त धर्मेंद्र पहले से शादीशुदा थे। चार बच्चों के पिता भी लेकिन दिल कभी किसी हिसाब किताब से चलता है क्या? हेमा मालिनी उनकी सादगी से, उनकी मुस्कान से और सबसे बढ़कर उनकी इज्जत देने वाली फितरत से बेहद प्रभावित हो गई थी। कहते हैं जब भी धर्मेंद्र पास आते हेमा के चेहरे की चमक कुछ और ही बढ़ जाती थी,
शायद यह संकेत था किस्मत के लिखे हुए उस अध्याय का जिसे दुनिया ने बाद में बॉलीवुड की सबसे चर्चित मोहब्बत का नाम दिया। धीरे-धीरे यह नजदीकियां दोस्ती से आगे बढ़ी और दोस्ती एक गहरी मोहब्बत में बदल गई। एक ऐसी मोहब्बत जिसने आगे चलकर पूरे बॉलीवुड को हिला कर रख दिया। इसी बीच अभिनेता जितेंद्र भी हेमा मालिनी के करीब आ चुके थे और हेमा के परिवार वालों को वह एक बेहतर और सुरक्षित विकल्प लग रहे थे क्योंकि वह सफल भी थे। आर्थिक रूप से मजबूत भी और शादी को लेकर गंभीर भी। बात यहां तक पहुंच गई कि हेमा और जितेंद्र की शादी की तारीख तक तय हो गई थी। लेकिन जब धर्मेंद्र को इस बात की भनक लगी तो वह खुद को रोक नहीं पाए और सीधे उस जगह पहुंच गए जहां शादी की चर्चा चल रही थी। उन्होंने जितेंद्र की उस समय की गर्लफ्रेंड को भी वहां बुला लिया और देखते ही देखते इतना हंगामा खड़ा हो गया कि शादी टूट गई,
कहा जाता है कि जिस लड़की के लिए जितेंद्र ने कभी संजीव कुमार को भी नजरअंदाज किया था, वही लड़की आखिरकार उनके हाथ से निकल गई। इस पूरे वाक्य के बाद हेमा मालिनी ने जितेंद्र से दूरी बना ली और धर्मेंद्र के और ज्यादा करीब आती चली गई। धीरे-धीरे धर्मेंद्र का प्यार हेमा मालिनी के दिल पर पूरी तरह छा गया। जबकि उनके घर में उनकी पत्नी प्रकाश कौर अकेले बच्चों की परवरिश कर रही थी। लेकिन उस समय धर्मेंद्र पूरी तरह बसंती के प्यार में खो चुके थे। बात और आगे तब बढ़ी जब साल 1978 में हेमा मालिनी के पिता का निधन हो गया। उनके पिता कभी नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी किसी शादीशुदा व्यक्ति से रिश्ता जोड़े। लेकिन उनके चले जाने के बाद यह आखिरी रुकावट भी हट गई,
आखिरकार हेमा मालिनी ने धर्मेंद्र के साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताने का फैसला कर लिया और यही फैसला उनकी प्रेम कहानी का सबसे बड़ा मोड़ बन गया। इसके बावजूद कि धर्मेंद्र का दिल हेमा मालिनी के लिए बेताब था। उनकी पहली पत्नी प्रकाश कौर ने उन्हें तलाक देने से साफ इंकार कर दिया और दो टूक कह दिया कि वह किसी भी हाल में अपना घर टूटने नहीं देंगी। यहीं से यह कहानी एक ऐसा बड़ा मोड़ लेती है जिसने सबको हैरान कर दिया। धर्मेंद्र चाहते थे कि वे हेमा मालिनी से शादी करें। लेकिन जब हिंदू रीति-रिवाजों से ऐसा करना नामुमकिन लगा तो दोनों ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरे देश में हलचल मचा दी। सिर्फ शादी के लिए उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया और अपने नाम भी बदल लिए। धर्मेंद्र बन गए दिलावर खान और हेमा मालिनी का नाम रख दिया गया आयशा,
फिर दोनों ने निकाह किया और हमेशा के लिए साथ रहने का वादा किया। लेकिन यह निकाह उनकी जिंदगी में सुकून की बजाय एक नई परेशानी लेकर आया। धर्मेंद्र ना तो अपनी पहली पत्नी प्रकाश कौर को छोड़ पाए और ना ही हेमा मालिनी को वह मुकम्मल जगह दे पाए जो एक पत्नी को मिलनी चाहिए। बस इतना हुआ कि उन्होंने दोनों को अलग-अलग घरों में बसा दिया। एक तरफ प्रकाश कौर और उनके चार बच्चे और दूसरी तरफ हेमा मालिनी और उनकी दो बेटियां। धर्मेंद्र का जीवन मानो दो घरों के बीच झूलती एक गाड़ी बन गया जो कभी एक स्टेशन पर रुकती कभी दूसरे पर। लेकिन किसी भी जगह पूरी तरह ठहर नहीं पाती। हेमा मालिनी ने सोचा था कि शादी के बाद उनकी दुनिया खुशियों से भर जाएगी,
लेकिन सच तो यह था कि निकाह और शादी का सर्टिफिकेट होने के बाद भी उन्हें वह सम्मान और अपनापन नहीं मिला, जो एक पत्नी के हिस्से आता है। धर्मेंद्र कभी उनके साथ खुलेआम नजर नहीं आते थे, ना किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में उनके साथ खड़े होते और ना ही दुनिया के सामने यह स्वीकार कर पाते कि हेमा मालिनी उनकी पत्नी है। मुंबई की गलियों से लेकर फिल्मी गलियारों तक सबको मालूम था कि धर्मेंद्र दो जिंदगियां, दो घर और दो परिवारों के बीच बंटे हुए हैं। एक तरफ था उनका पहला परिवार प्रकाश कौर, सनी देओल, बॉबी देओल, अजीता और विजेता और दूसरी तरफ थी हेमा मालिनी अपनी बेटियों ईशा और अहाना के साथ। लेकिन दुख की बात यह रही कि दोनों घरों को ही एक पूरा पति और पूरा पिता नहीं मिल पाया। वह कभी दिन में एक घर तो रात में दूसरे घर, कभी यहां तो कभी वहां और दोनों तरफ के रिश्ते ऐसे हो गए थे,
जैसे शीशे को बीच से तोड़ दिया जाए। दोनों हिस्से अलग भी हो तो भी चुभन बनी रहती है। हेमा मालिनी के दिल की भी एक उम्मीद थी कि एक दिन धर्मेंद्र उनके साथ खुलेआम आएंगे और गर्व से कहेंगे कि हां यही मेरी पत्नी है। लेकिन वह ऐसा करने का साहस नहीं जुटा पाए क्योंकि उनकी पहली फैमिली बड़ी थी और प्रकाश कौर पहले ही साफ कह चुकी थी कि वह किसी भी हालत में तलाक नहीं देंगी और ना ही अपना घर टूटने देंगी। इस सबके बीच हेमा खुद को बेहद अकेला महसूस करने लगी। एक तरफ उनका प्यार था तो दूसरी तरफ समाज की बातें, रिश्तों की जंजीरें और लोगों के ताने। दुनिया उन्हें एक घर तोड़ने वाली और किसी की खुशियां छीनने वाली महिला कहती रही।



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